शांत सागर
आज हूँ लाचार सा कर्म का रण हैं नहीं
काज ऐसा कौन सा हो सके राह वहीं
राज दिल के मसलते नित काम है कहीं
लाज आती थी आज करता कर्म वहीं ।
हमसफर मेरा हुआ कमजोर घना संबल जो था
चेतना का नित नया हिल्लोर भरता हृदय मे था
मूक नहीं पर चिढता हैं आज जो उल्लास मय था
हे समय यह क्या परिवर्तन तू ले आया जो न था ।
एक दूजे का आसरा ढूँढे वह ठौर रही नहीं
रोक सके अरमान अपने दृढ़ता की डोर नहीं
मूक से निहारते अब कामना मन मे मिटती रही
जिन्हें सिंचा रक्त बहा वे आसरा स्नेह देते नहीं ।
वक्त का मिजाज बदला राह मन अभी बदला कहां
शक्ति का अभिमान गया पर तन भाव बदला कहां
मुक्ति काम से मिली पर तन की कसरत मिटी कहां
युक्ति का अभ्यास नहीं पर जीना हैं युक्ति से यहां ।
हर कोई भागता यहां दौड़ लग रही हौड की
डरता भी भागता हैं नहीं मन मे जीत पक्की
क्या करे दौडना बनी हैं अब लाचारी उसकी
दिखे दौडता सा अस्मिता रहे दृष्टि मे जन की।
बार बार कैसे करते जाते हम गलती पर गलती
भार पूरा होने पर भी क्यों बौझे मे नजर गडती
उठाते ही नया बौझा थरथराकर हैं देह गिरती
विवशता से फिर किसी आसरे मे नजर उठती ।
चल अकेले चल राहगीर थकना मंहगा पडेगा
कल के भरोसे गर रूक गया तो कैसे जियेगा
भले तेरा प्राण जाये वैसे भी तो जिन्दा मरेगा
गिरे फिर उठे हैं सुना हैं मान आज का करेगा।
परिवार का हाल भेद भरा स्वार्थ का जाली पिटारा
हर सदस्य बुनता जाल हैं स्नेह का दिखाता नजारा
सहारा बनेगा बुढ़ापे होते सहृदय हैं चूसता रक्त पूरा
बेजान से खा ठौकरो को करते हैं उसकी मांग पूरा ।
बूरे हम सही पर कहीं कोने मे हमदर्दी भी रखते हैं
भूले हैं आज वक्त सताये स्मृति अहसास रखते हैं
डूबे हैं कीचड़ पर गंदगी का आभास भी करते हैं
झूके हैं हर जगह फिर भी अकड का अहसास रखते हैं ।
क्या बताऊँ क्या हैं जीना समझ मे भी तो आये
समझे हुए हो उनकी नासमझी कही जा न पाये
कौन कहे समझ गया सब शेष रहा मुझे न आये
तमाम उम्र जाये पर जिन्दगी तू समझ न आये।
विवेक कितना हैं विवेकी स्वयं कुछ कहें तो जाने
कहे हुए की सत्यता का सार हमसे मिला न माने
प्रभुता की जिद्द ऐसी सत्यता जीवन कैसे जाने
हार को ही जीत कहें जीत को ही क्यों हार माने।
रात को गर काली कह दूँ क्या झगड तो नहीं पडोगे
दिन को अगर रोशन कहूँ तो दुश्मनी का दांव भरोगे
रात दिन के खेल का क्या नटी दंभी खुद तुम बनोगे
दर्शक गण खेल का सार ले तब भी ऐतराज करोगे।
मिले थे तुम लगता था खुशी का अंबार लगेगा
फूले नहीं समाते थे सारा संसार खुशबू महकेगा
सागर की लहरों सा नित जीवन उन्माद भरेगा
फूलों की लावण्यता से हमारा विपिन महकेगा।
मिलना संसार मे हमारा क्या मिसाल मिलेगी
रहना साथ साथ क्या स्नेह धारा नित बहेगी
कल की सुहावनी आशा अब फल रस चखेगी
स्मृति सुखद आकारवान बनी अमृत बरसेगी।
कहां गया वह सामिप्य का सुखद अफसाना
कहां गया वह मोह भरा आशक्ति का खजाना
कहां गया वह झूठ मूठ का तेरा रोना रूलाना
कहां गया वह रूठना तेरा ओर मेरा था मनाना।
कहीं उड न जाय नींद तुम्हारी जगाने से हमें डर था
कहीं रूसवाई से दिल कसोट न हो हमें अहसास था
कहीं तुम्हारी भावना का गीत अधूरा न रहे मैं तत्पर था
कहीं पराये मंजिल बाधा न बने मिटने को मैं बेताब था।
भर भर प्याला मधुरस मादक विस्मृत मदहोश हुआ
कर कर जीवन कर्म घनेरे आनंदित सारा जग हुआ
फिर फिर रसताल डूब डूबके स्नेह धार मे लीन हुआ
रस मोती बिनते पल पल साथी तेरे मेरे का भान हुआ ।
ईश लीला का वरदान मेरे जीवन
क्या तूझे अपना मान सकता मन
मर्म तुझे ढूँढता फिर हैं अकेलापन
विरह जलजात उभरा हैं सूनापन।
नेह तार लगता टूट गये हैं
संगीत जीवन सूने पड़े हैं
राग अब विराग हो गये हैं
चित निर्मम भाव छा गये हैं।
परिवर्तन का यह दौर कैसा
बेसमझे विवेकी चित जैसा
विराग का यह भाव कैसा
रागी घीरा भ्रम जाल जैसा।
कारण कमनीय क्यों दौडता रे मन
आवरण मोह आतुर क्यों रे जीवन
नहीं पाया रे तूने मारक मन भावन
फिर क्यों दौडा लालच राह जीवन ।
जाना कौन सार लीला भ्रम संसार का
जाना वहीं जो कहता निस्सार जग का
निस्सार कहना क्या सार हैं जीवन का
भटकाव घना घनघोर बना हैं मानव का।
हे जीवन रे प्यारे प्यार से कुछ कह दो
मीठी मीठी सी बात हो कुछ तो कह दो
जीये हो खूबी से कुछ सार हो तो कह दो
रस सागर की तुच्छ हिल्लोर हो तो दे दो।
सूनेपन मे कुछ रस तो घोलो
अविरल नीरधार का मन खोलो
बिखर पडेगा नेह दरिया बोलो
गहरी घनी वेदना चित की तोलो।
पाकर भी खाली खाली हूँ
खोकर भी खाली खाली हूँ
सोकर भी सोया नहीं हूँ
जागा भी जागा कहां हूँ ।
यहाँ कुछ हैं यह आभास क्यों हैं
मोह हैं नहीं पर अटकाव क्यों हैं
लगता ऐसा कहीं कुछ बाकी हैं
चेतना का ऐसा भटकाव क्यों हैं ।
जहां जीवन भार बना हैं
कहां रही शांत हवा हैं
धूंध छायी जिन्दगी हैं
यहां कहां सार तत्व हैं ।
किसे कहें अपना नहीं भावना रही नहीं
हमें बात बहुत करनी हैं सुनने वाला नहीं
जाकर कहें किसे खुद मेरा ठिकाना नहीं