बहुत चला हूँ
अपनी तरफ से नही रखी
कोई कमी
हर चाल चल चुका
बाहर का अपना करने निमित्त
सूध बूध खोकर
गिरता रहा हर बार
मानव होने के सामान्य गुणों से
भीतर का कोई कोना
कतरे भर मानव रहने की गरज करता
झटका देता रहा बार बार
हर बार सुना अनसुना किया
नही झांका तनिक भी
असलियत देते भीतर के सत्य पर
आँख भी कान भी रूंघ ही गये
तभी कर पाया बाहर का अपना
ओर आज
लगता जाता लगातार
वही खडा रह गया
चला जहां से
संग्रह नही बन सका अंगीकृत
देखता जाता सबकुछ वही
प्रिय अविश्वसनीय
वासनाऐं अविस्मरणीय
आकांक्षाऐ अपूरणीय
चला तो सही तमाम उम्र
खतरनाक रास्ते बाहरी
भीतर की शून्यता
पागलपन का अहसास देती
चिढा रही जिन्दगी तुझे ।
छगन लाल गर्ग ।
अपनी तरफ से नही रखी
कोई कमी
हर चाल चल चुका
बाहर का अपना करने निमित्त
सूध बूध खोकर
गिरता रहा हर बार
मानव होने के सामान्य गुणों से
भीतर का कोई कोना
कतरे भर मानव रहने की गरज करता
झटका देता रहा बार बार
हर बार सुना अनसुना किया
नही झांका तनिक भी
असलियत देते भीतर के सत्य पर
आँख भी कान भी रूंघ ही गये
तभी कर पाया बाहर का अपना
ओर आज
लगता जाता लगातार
वही खडा रह गया
चला जहां से
संग्रह नही बन सका अंगीकृत
देखता जाता सबकुछ वही
प्रिय अविश्वसनीय
वासनाऐं अविस्मरणीय
आकांक्षाऐ अपूरणीय
चला तो सही तमाम उम्र
खतरनाक रास्ते बाहरी
भीतर की शून्यता
पागलपन का अहसास देती
चिढा रही जिन्दगी तुझे ।
छगन लाल गर्ग ।