असत्य कैसे कहूँ
साक्षात देखा स्थूल मोहक सौन्दर्य
सुरभि बिखेरता निखरता हरपल
आह कटाक्ष का जादू
असीम सौन्दर्यमयी सुखदायी
दिव्यता का निचौड पृथ्वी पर
विषय सुख वासना का स्पर्श
अमिट विश्वास भ्रान्तिमय
कि जीवन वासना का संपुट
असीम सुख का सार विषय सार
ओर इसी भ्रम स्फूटित ऊर्जा स्त्रोत लिए
बहता रहा अविरल वासना नद
ओर धंसता रहा अनित्य काम सुख
स्पर्श रूप रस का कमनीय झौंका
बहता रहा उष्ण तपन मरूभूमि
ओर वासना जल होता रहा मृगतृष्णा
खूब भटका थका हारा
अब हुआ हूँ शून्य चित
अर्थहीन जिन्दगी का अतीत अब
रीत गया
मन शरीर ओर अहंकार मौन हुए
अब नहीं हूँ मैं भी
अचेतन का अंश सा अज्ञात हूँ आज ।
छगन लाल गर्ग ।