Saturday, May 28, 2016

चेतना3


दौडे भाये जीवन के खेल
खूब सहे धोखे रहा न मेल
फरेबी नेह का खेला खेल
थका तन कैसे बोले बोल।
वासना जाल मजबूत घना
कामना चाह निखिल बना
सच्चा नेह शिथिलता सना
महक न सका जीवन घना।
झलक तेरी व्यथा दे जाती
छलक नयन झरने हो जाती
पलक पल मे भीगी हो जाती
फलक विरह पीड़ा बढ जाती।
ऐ दिल करू क्या कुछ तो बता
रहूं इसी हाल नहीं खुद का पता
मैं काम का नहीं मेरी नहीं सता
उम्र बिती रात का भय रहा सता।
अंधेरा हैं आजा मुझे घेर ले रोशनी जा घना तम देख ले
सुवास जरा रूख बदल ले खुशबू जरा झलक दिखा ले ।
मैं कृति की क्रिया बुद्धि हूँ माप तोल जीने का सिखाती हूँ
गिर ना सके जीवन भर तू अनुभव का हाल सिखाती हूँ ।
दिल दीन दया मे उलझ गया हैं
मति मानक दिशा हीन हो गये हैं
ढूँढना अब सार असार हो गया हैं
मन मान केवल दीन रह गया हैं ।
मैं जभी समझना चाहता हूँ प्रयास विफल हो जाते हैं
भूला विवेक भ्रमित होकर परिहास स्वयं हो जाता हैं ।
इस क्रिया मे कुछ ओर नहीं केवल दर्द भुगतना हैं
मैं सर्वस्व परित्याग करता पर बदले मे कुछ पाया नहीं हैं ।।
अल्पज्ञ होकर पूर्ण दावा करता
भव सागर टोह लीला दिखाता
खेल अजीब अनवरत बतलाता
जाल गजब गूंथता न घबराता।
अहं नित नव आकार लेता
हार से कभी नहीं घबराता
भरा अहं का प्याला रहता
लघु सारे वृहद मैं ही होता।
खेल खेला जीया मन भाया
तोड़ रस्म पीया रस माया
लूटा बहुतो का हित न भाया
छूटा सब कुछ रही न छाया।
ताप घना अब तडप रहा हूँ
ढाक रहा नहीं उघड रहा हूँ
साथ रहा नहीं बेहाल रहा हूँ
शापित जीवन बोझ बना हूँ ।
आओ आओ पास क्यों रुके हो
हिसाब लो दयालु अब क्यों हो
ऐसे मे रूको मत मौत बने हो
हमदर्दी मत दो दयालु बड़े हो।
उदभ्रांत लौ जी रहा हूँ गगन शून्यता बन रहा हूँ
भटकन पवन बन गया हूँ पत्थरों से टकराता रहा हूँ ।
मुस्कान देता नभ कुछ कहता हैं
दामिनी मिस संकेत आ रहा हैं
क्या प्रभु रस नागर छा रहे हैं
रसधार मिलन सुख आ रहा हैं ।
चेतना विभोर नाचना चाहती हैं
स्मृति विगत बनना चाहती हैं
पलक थिर राह लगी चाहती हैं
मिलना बूँद जलाशय चाहती हैं ।
दामन मेरा खाली खाली कमा कमाई भरा हाली
रीता कैसे समझ भोली पट फट चुकी अब मेरी झोली।
लोग बता रहे भरता नहीं हैं
मौन रहा मन मानता नहीं हैं
रूकूं कैसे लालसा घनी हैं
खपा खूब झोली खाली हैं ।
वासना अनंत भार बहुत हैं
कामना गहरी जड मजबूत हैं
लालसा रिस्ता रक्तिम रहता हैं
भावना निष्कासित हो गयी हैं ।
डाल डाल पंछी चहके कैसे पवन ताप ठंडी बदले कैसे
सुलगते सूरज जले भू ऐसे आग लगे घर जलता जैसे।
फिर मानव लाचार हुआ हैं नीरव मन कुंठित हुआ हैं
दानव दल सबल हुआ हैं मानवता का नाश हुआ हैं ।
भार बढा हालात खराब हैं
जाल घने जीवन फसा हैं
निकले कैसे भंवर पड़ा हैं
मददगार मिलते कहां हैं ।
दिन रात बैचेनी हैं विश्राम नहीं हैं
जलता ज्वाला तन संताप घना हैं
गिराया गहरे कूप डूब रहा तन हैं
हारा बाजी खेल खिलाड़ी नहीं हैं ।
भूल से भेजा जग जीने की कला नहीं
मूल ही कमजोर हैं दिखते सबल सही
देखा देखी जीना चाहा जीने देंगे नही
भूल तभी सुधरेगी जायेंगे आये वहीं ।
रो ले मनवा तू जी भर रो ले
खो ले राग लाग सब खो ले
हो ले परहित काज तू हो ले
धो ले जन्मों के दाग तू धो ले।
प्यास घनी तेरी प्यासा रहेगा
लालच बढ़ी तेरी हताश रहेगा
अहं तेरा आसरा निराश रहेगा
कामना पूत तू परास्त ही रहेगा ।
गली गली भटका प्रेम गली देखी कही
ठौर ठौर ठहरा शांत ठौर देखी नहीं
मन मन जोडे पर जुडे मन देखें कहीं
धन जोड़ा तन तोड़ भरा कोष हैं कहीं ।
यहां पाया यही खोकर सूना ही रह जाना हैं
उसने बेदाग दिया गहरा दाग दिया लौटाना हैं
हिम्मत कैसे चित रहे पाप का भार बढाया
है
हे दयासागर तू छोड़ कर्म सिर झुकाया हैं ।
पापी खोलो पाप गठरी भेद
कामी बोलो हैं घावों का मैंद
लौभी लूटे हैं जीवो का छेद
डोली नैया रे तब क्यों खेद।
नाव डूबी मेरी नाव डूबी राग रोया मेरा राग रोया
नाम खूबी राम नाम खूबी ऊबार ढोया रे ऊबार ढोया।
भरा छल खेल जग भ्रामक
खरा सार राम नाम सार्थक
जरा सोच भ्रम तोड़ दाहक
तरा मोह जाल छोड़ धारक।
चाल कपट कर सुख हैं जोड़ा
काल कराल से मुख हैं मोडा
डाल बदले नित छांव हैं थोड़ा
प्यास मिटे नहीं परहित छोडा।
ताल टूटे टीस मन की डाल मुडे तने तन की
चाल रूके बूरे पथ की पाल बंधे हित पर की।
लोल तरंग रंगे सूरज की
ताजगी भर दे जीवन की
खोले गांठ कुंठित मन की
नाव उतरे पार मानव की।
छोड़ मनवा राह मोह की
फोड़ संसारी गगरी नेह की
जोड़ रश्मि सत स्नेह की
दोड मन डौर पकड रब की।
चपल चांदनी शीतल छितराई
पवन पावन मंथर गति लहराई
गगन अलौकिक आभा अति छाई
मगन हुआ रे मन शोभा चित भाई।
परम सत झलक मिले परा हर्षाई
कर्म धर्म जुड़े एकाकार हुए भाई
एक तत्व संगठित सत्य बनाई
परमशक्ति साकार जग मे आई।
नमः नमो सत सत दुम दुर्गा माई
भव भव माँ तेरी शक्ति घनी छाई
महाकाल महेश जन आशीष दाई
कृपा करो माँ जग जन सेवक ताई।