समझदार सब कहे पढ़े तुम बेशर्म हो
खबरदार नीचों ऊँचों के आडे आते हो
बाप दादों की परंपरा धूल मे मिलाते हो
खुद नारकी जीव हमें नरक गिराते हो।
नास्ता कहां ठंडी रोटी कुत्तों की रात बची दे दूँ
सुबह आता कुत्ता आज आया नहीं तुमको दे दूँ
मजूरी मांग ही लेना आटे बिना बच्चों को क्या दूँ
गुजारा होता नहीं मैं पडोस मे मजूरी का कह दूँ।
झील की गहराई धैर्य जीवन का गढती हैं
वहीं गहराई असीम जीवन संतोष देती हैं
ऊछाल आने पर आलोडित प्राण चेतना हैं
चेतना की सक्रियता डूबोता प्राण राग हैं ।
थाह कैसे मिले असीम तरंग हिलोडित हो रही
रूके थोड़ा तो एक नजर भर की पहचान वहीं
तनमय होना मनमय होने की तैयारी ही सही
एकरस हुए बिना असीमता की थाह मिले नहीं ।
करवट वक्त कब जब नहीं लेता
बरकत भाग्य मे कब नहीं देता
हरकत जीवन कब नही करता
कर्म मानव जब पग नहीं रखता।
गल नहीं सकता पत्थर
हिम खंड ताप बने नीर
निर्जीव लक्षण हैं पत्थर
हिम खंड रखे तरल धार।
समापन जीवन रहते क्यों कहते हो
क्या कहने से समापन क्रम करते हो
लगे ऐसा पर यह वश नहीं दंभ मे हो
शक्ति इतनी रखते भी झूठ फैलाते हो।
हारा हुआ कभी दंभ नहीं करता
मरता कभी शिकवा नहीं करता
झूठा कभी सच्चाई नहीं कहता
लूटा वो कभी इक्कटा नहीं करता।
कभी इधर कभी उधर ठोकरे सभी की खाया
किसी का प्यार तो किसी की घृणा पूरी पाया
कहीं दुत्कारा तो कहीं पुस्कारा मिला वो भाया
कौन अपना कौन पराया सभी ने बेमन अपनाया।
गुलाब गंध पवन संग मिलकर प्रसार पाती हैं
सुगंध पवन मे बंटती तभी असलियत पाती हैं
हम बेमतलब संग्रहण काबलियत खुद को करते हैं
कारण यही कुछ रखते पर गुण बांट पाते नहीं हैं ।