क्या कहूँ कहा जाता नहीं
अनजान हूँ जान पाता नहीं
भटकता हूँ नित्य मंजिल नहीं
आशा गई कोई सहारा नहीं ।
फफक उठे हैं राग मेरे ललक रहे गीत अनकहे।
अवरुद्ध होकर प्राण मेरे ऑसू बने नित बह रहे।।
आँसुओं का एक कतरा अरमान भरी एक दुनिया ।
अनवरत चलते रण जग मे डूब मरती सारी दूनिया।।
राज जीवन राज ही हैं हार केवल सार ही हैं ।
अक्ल झूठी बात ही हैं मोह भ्रम संसार ही हैं।।
जिसने जाना वहीं पागल हैं नहीं जाना वहीं पागल हैं ।
कब कहे किसे कहें सयाना सयानापन ही पागलपन हैं ।।
फिर भी हम झुक सकते नहीं हैं ।
अस्तित्व जगत को बताते रहे हैं ।
धनहीन जन को झुकना पडा हैं ।
विवश जन शरणागत होते रहे हैं ।।
ऐठ जड जीवन कम नहीं हैं
पकडी हमने हमराह हुई हैं
वक्त की विकराल हरकत हैं
आज दगाबाज दुखद बनी हैं ।
नहीं जानती अपना पराया रही शान से जिसने अपनाया ।
वहीं मानमनवल निरंतर पाया वहीं चाहती चाहे घर पराया।।
कब रहा कौन रहा सहारा बन स्नेह कर
सूनेपन के आँगन मे विकसे कैसे रजनीकर
रस बरस बरस रीता रवन भवन शून्य भर
मद मादक मोहक मन मनीष मठ मात्र भर।
सार जीवन कहना मन भूल गया हैं
उपयोग अब झुलस मूरझा गया हैं
नाकाम यह तन मन भेद दे गया हैं
भंगूर देह का सौरभ सीखा गया हैं ।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूतल जीवन रह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ सा जड देह रह गया हैं ।।
चाल पग फिर नहीं चलता फाग फाल्गुन कैसे अलापता।
राग प्रेमिल सुखा तपन देता भाव बाधित कैसे बहता।।
हर दिल सुना ठहराव पाता हर शाम गम जुदा ठौर लेता।
रात घना असीम दर्द मिलता कुंठित जीवन कैसे पार पाता।।
इस झील मे विस्तार कैसा इस रात को प्रकाश कैसा।
इस सुखे तल रस कैसा इस विराग मे यह राग कैसा।।
सागर अगर कहीं रहता हैं गागर रस कहीं तो होता।
नागर अगर कहीं झलकता हैं सारंग राग कहीं तो गाता।।
नयन देखना भूल चुके हैं सुंदरता का सूखद सपना।
हृदय पीडा मे डूब चुका हैं सुख बने कैसे अपना।।
विकल हर पल हे जीवन सकल भार संभालूं कैसे।
आहत हर श्वास घायल मन जीवन आगे सरकाऊं कैसे।।
वासना का जकड जाल असीम
जकड घेरा घेरे जीवन कुसुम
दिशा धुंधली हो चुका अब तम
रोशनी कतरा नहीं कैसे ले दम ।
छल फरेब का दौर आया सरल कठिन सब साथ लाया।
कब समझे हैं संचय आया मन विफल हुआ विवेक छाया।।
परमाणु रचित तन रह गया हैं
सजावट तौल मय हो गयी हैं
मुस्कान सभ्य अब मिल गई हैं
रेशम आभूषण देह बन गयी हैं ।
कामना पंखमय उड रही हैं धारणा धूमिल हो रही हैं ।
आवरणमय चाह सत्य बनी हैं जीवंत जीवन हो रहा हैं ।।
बाहर बाहर चमक दमक हैं भीतर भीतर खालीपन हैं ।
दीप जलाता उखडापन हैं रोशनी पर भरोसा कम हैं ।।
आँखें देखती सघन उजाला
भीतर सघन अंधकार मैला
अनंत ऊँची संसार की बेला
हुलश भरा अहंकार का रेला।
तू नहीं मैं हूँ शौर सकल हैं बोल बोल मे राग विलग हैं ।
दमन दमन का भेद विजय हैं जो दमन हैं जय का धन हैं ।।
ऊँचे ऊँचे बोल समेटकर शारदे वरदान सहेजकर ।
करणीय ताल की थपकी देकर लूट मचाये सहलाकर ।।
जादूगर का ऊँचा करतब लेकर मनमोहक राग की वीणा देकर ।
उलझन उलझे जन रंग पाकर फंसे गुंफन मे रहे मन मसोस कर ।।
ढोता चला जो मिला हैं बोझा खोता रहा जो मिला वो मेरा।
जग से सहेजा धन व दौलत ऐठ अकड का हुआ बसेरा।।
पाप कर्म की गठरी भारी जन्म जन्मों से बांधी सारी।
बोझा घना पर कर्म जारी जुटा हूँ जी भर हो जाय भारी।।
कुछ तो लायक बनकर जाऊं काम छोडूँ तब कुछ दाम गिनाऊँ।
ओलाद सबक ले सके सिखाऊं धन दौलत का मूल्य समझाऊँ।।
पुस्तकों मे सार कहां हैं धन का मर्म राह कहां हैं ।
कोरे सीधे रास्ते जहां हैं आम आदमी ही मरा पडा हैं ।।
उलटफेर नहीं समझा जन मन पटकन कला परखा जो पाया।
सरल सार जीवन की गिरावट असीम हो जब धन की छाया।।
अब विवेक उन्नति कर चुका हैं
सबको समझ बहुत दे चुका हैं
अभागे सत्यवान पिछड गये हैं
प्रगति पथ से ऐसे हटाने पड़े हैं ।
कहानी डूब गयी हैं पूरी नयी कहानी जीवंत नहीं हैं ।
हो चुका जीवन चकनाचूर कहानी धरातल नहीं हैं ।।
रटे रटाये सूने बोल चमकहीन हुआ हैं खौल।
कहा अनकहा हैं मोल जीवन बना है मखोल।।
सूना सूना तू कुछ बोल रूखा रूखा कुछ घौल।
वेदना हैं वहीं तो डाल पीड़ा का रस भी अनमोल ।।
विरह जलन असीम की लहर
मिलन पल क्षणिक भ्रम नजर
कण सा बना परिहास संसार
चिर वेदना ही जीवन का सार।
खोल धन कपाट सारे मोल मन विचार सारे।
टोह का हमसफर डारे खो चुका हमदर्द सारे।।
आज हैं जन्मों की झोली भरी भरी नहीं हैं खाली।
गंध आई जली हैं होली राख हुई पुँजी बदहाली ।।
संचित का यह दर्द कैसा बर्बादी का मजार जैसा।
चेतना का दंड कैसा निर्दोष जन के मरण जैसा।।
हार अब तू हार जा मन हठ छोड तू भाग जा मन।
कल काल कर्कश छाई फैन विष वयाल घेरे मे तन।।
पीना पडेगा जहर सारा जीना पडेगा काल सारा।
खाना पडेगा उछटन घोरा तू विवश हैं पीडा का मारा।।
विवशता का खोल जीवन समर्थता का ढोल जीवन ।
कायरता का पोल जीवन सुंदरता का खोट जीवन ।।
नकली असली का भ्रम जीवन सुख दुख का जंजाल जीवन ।