चंपा का वृक्ष साक्षी बना
अंधेरों उजालों का
नहीं संचय कि भुगती विपदायें
नहीं रोई बेतहाशा
लगातार खुले कान पवन संग मिल
सहमति मे हिलाते रहे
ओर पीडामय स्वर मे देते रूदन ध्वनि
पहुँच जाते ठीक मेरे कानों तक
छाया का बिखराव कब रहा एक सा
नहीं रखती आत्मीयता
कि बिखरे अस्तित्व को समेटने का
दे अवसर
नहीं हुआ कभी ऐसा
कि स्पंदन करुणा का बहा हो
जमाव का विशाल दरिया
चाहता फूटना
ओर जब यह होगा साक्षी बना चंपा
कह देगा हर छाया स्नेही को
नहीं रहता अस्तित्व जब बहने लगते
जीवन मे करूणा के अंश
खाली हृदय नहीं पा सकता स्पंदन
फिर कि ले सके श्वास
जिसे कहते जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।