Monday, May 2, 2016

उभरता प्रश्न ।


जीवन जीने का स्थापित
निश्चित ढर्रा
ओर वहीं लकीर का उपदेश
मिलने लग जाता समझ के साथ
नैतिक शिक्षा
ओर यह एक आंशिक हिस्सा नहीं
अंगीकृत जोड़ना पडता समाज मे
ओर इस प्रांजलता का निखार
जिन्दगी की चमक
यही शदियो से होता रहा
ओर हम नित नये कीर्तिमान से चमकते रहे
लेकिन यह भी होता रहता कभी कभी
कुछ लोग नया खुद सोचते अपना
विवेक से करते विवेचना गुण अवगुण
का संश्लेषण विश्लेषण
ओर फिर जीते जीवन शायद अपना
अपनी तरह का
पर समाज से विपरीत
सीधी लकीर से ऊबड खाबड टेढा मेढा
वहीं से होने लगता बिखराव
मूल्यों का सच लेना चाहता करवट
तोल माप कर आये निर्णय
चाहता अपनाना अपने जीवन
नहीं उसका विद्रोह या विक्षिप्त दशा
केवल चेतन जो निर्णायक बना
अपने जीवन का
यह कैसे कहोगे तुम असामाजिकता
प्रश्न उभरना चाहता उतर के लिए ।
छगन लाल गर्ग ।