झेलना होगा तनाव
यदि अस्तित्व रहे
जीना चाहूँ पर संतुलित
ओर तजुर्बा कहता
असंभव हैं संतुलन
चाह का असीम सागर
विशाल विश्व चाहता
अपने भीतर ओर यह
कैसे हो संभव
मानव रहते वितृष्णा का गागर
प्रति पल रीता जाता
भरता नही
ओर भरा भरा दिखता नही
दृश्य दिखता भरा भरा
ओर उफान भरता
छलकने के बाद भी
बहुत गूढ प्रवंचना का जाल
असत छूटता नही सत भरता नही
ओर ऐसे मे
बिना खाली पन ठहराव हो कहां
ओर देखो तो दुर्भाग्य मेरा
छलकता रहता शुद्धतम
असार का संग्रहण
बहुत भाया मृगतृष्णा समान
देता रहा तस्सली सुखों के प्रभात की
नही हो पाया आज तक
आ चुका
जीवन का उतराफाल्गुन
संचय कुछ नही रीता हूँ घना
ओर अब शिवाय तनाव
नही कुछ मेरा
अब अंतिम यात्रा की घडी
चलो चलते
बिना तनाव संतुलन का सार लिए
असीम पथ ।
छगन लाल गर्ग ।
यदि अस्तित्व रहे
जीना चाहूँ पर संतुलित
ओर तजुर्बा कहता
असंभव हैं संतुलन
चाह का असीम सागर
विशाल विश्व चाहता
अपने भीतर ओर यह
कैसे हो संभव
मानव रहते वितृष्णा का गागर
प्रति पल रीता जाता
भरता नही
ओर भरा भरा दिखता नही
दृश्य दिखता भरा भरा
ओर उफान भरता
छलकने के बाद भी
बहुत गूढ प्रवंचना का जाल
असत छूटता नही सत भरता नही
ओर ऐसे मे
बिना खाली पन ठहराव हो कहां
ओर देखो तो दुर्भाग्य मेरा
छलकता रहता शुद्धतम
असार का संग्रहण
बहुत भाया मृगतृष्णा समान
देता रहा तस्सली सुखों के प्रभात की
नही हो पाया आज तक
आ चुका
जीवन का उतराफाल्गुन
संचय कुछ नही रीता हूँ घना
ओर अब शिवाय तनाव
नही कुछ मेरा
अब अंतिम यात्रा की घडी
चलो चलते
बिना तनाव संतुलन का सार लिए
असीम पथ ।
छगन लाल गर्ग ।