Thursday, May 5, 2016

यथार्थ

नही लगता अच्छा
हर बार
अभिव्यक्ति दुषित ज्ञान से
प्रभावित रहे
आधा अधकचरा अनुभव
सुना सुनाया
गुँथकर बनाना चाहता कविता का
आशियाना ऊँचाई पर
ओर करता जाता शास्त्रीय व्याख्या
सुविधाजनक
जिसमे नही तनिक अंश सत्य भरा
जीवंत कटु यथार्थ का
कि काम आ सके आम इंसान के
तुम्हारा ऊँचा उठा आशियाना केवल
कंगूरा प्रसिद्धि का
हजार बार पडताल के बाद भी
कुछ पाओगे नही जीवन लायक
फिर तुम्हारी मंडली के
अतिरिक्त कौन ऐसा
विश्वास करता बिना आधार
समय के पहरेदार ऊंघते रहते निरंतर
यही कारण कि
साहित्य भी सत से असत की ओर
निर्मल परिवेश त्यागकर
आधुनिक बिम्ब पहनता
ओर होता जाता
गुटबाजी का शिकार या
वकील बनने का इच्छुक कतार खडा
ऊपर घने ऊँचे आशियानों की पहरेदारी करने
ओर बिना जल गगरी सा छलकता
प्रफुल्लित अकड में बेबूझ जीने लगा
चैतन्य रश्मि तीक्ष्ण होने तक मिथ्या झुलसने तक
ओर जलते आशियानों संग
आत्मीय रस कडवाहट भरने से पहले
जागो शिल्पी मेरे ।
छगन लाल गर्ग ।