Sunday, May 8, 2016

आशक्ति ।

बहुत याद करता
जीवन के हमसफर बिछूडे
आँखे थक चुकी
झलक नही पाता हृदय बसी
आकार अक्स ढूँढने लगता
जहां कही बहता नेह निर्झर
पर नही होते तुम वहां
भ्रमित ठगा सा करता जाता
आरोपित तुम्हें ओरों में
सुनते हो सच हो उठता आरोपण मेरा
हाँ तुम मुसकराते रहते ओरों मे भी
मेरे बनते मिटते
बडा गहरे तल मे
आत्मीय मेरे डूब चूका
तेरी भावमय आशक्ति स्पंदन देती
मेरी चेतना को
कैसे मिटे
आशक्ति अज्ञान
संस्कारित मेरे से किया तुम्हें
प्रख्यात कारण
निर्वहन क्रियाओं का भिज्ञ
संस्कार कुल से प्राप्त मुझे
उसी बदोलत बना में उद्धत शुद्ध
नही यह मात्र भ्रांति का ज्ञान
जीया बंदिश भी
ओर तब कही पाया हूँ शास्त्रीय ज्ञान
सुनो तो हूँ आत्म स्वरूप
शुद्ध चैतन्य
नित्य शास्वत आत्म विश्वास
नही जड सम असत
संसार की तरह
जो नित्य परिवर्तित
तुम्हारी तरह अदृश्य भी
दृश्य भी
यह भ्रम शास्त्र संगत
पर जटिल भ्रामक
पर पुख्ता सबूत देता
शास्त्रीय ज्ञानी नही
समूचा मर्मज्ञ
विचारक नही
ओर मै अब जीने लगा हूँ
निस्सार जीवन
कर्मकांड मूढ आचरण
कूपमंडूकता युक्त
ओर मैं अमोलक जन्म
केवल तृष्णा आशक्ति तैरता
कभी गर्त डूबता गहरे
जन्म विवाह दौलत मकान
यही आशक्ति देती मुझे
शायद अंत तक
नही उपाय कोई कैसे बचूँ
मिथ्या भ्रम निरंतर
भ्रमण जन्म भी मृत्यु भी
देह भी आशक्ति भी
तनिक भीतर भान तो दो
शायद मिटे सके आशक्ति अज्ञान ।
छगन लाल गर्ग ।