खिले हमारा जीवन कुसुम
मिटे सारा संताप असीम
बीते विकराल काल विषम
मिले शास्वत सुख असीम ।
कौन जाना हैं कब जान पाया
खेल कुदरत कौन जान पाया
कर्म सृजन जगत बदले माया
कुदरत कहर से विनाश छाया।
उधर मानव लगता रहस्य की खोज
इधर प्रकृति लेने लगती श्वास रोज
मानव सुलभ करे जीवन सुख खोज
प्रकृति विध्वंस अति रहे भारी बोझ।
पारिवारिक सुरक्षा मिले हमें चाहिये
जिन्दगी जौखिम बन गई कैसे जीये
संसार जनों से भरा हाल बेहाल हुये
आज व्यक्ति अति से असंतुलित हुये।
यातनामय जीवन अगर मिला हैं
इसका हर क्षण बहुमूल्य होता हैं
झूके बिना यदि दुख झेलता नर हैं
तो निखर दुख महान बन जाता हैं ।
दुख खतरनाक भी होते हैं
दुख प्रीति कर बी होते हैं
दुख दुश्मन मित्र भी होते हैं
निर्भर हमारे उपयोग पर हैं ।
दुख नित मांझता रहता हमें हैं
चुभते हमें बालू कंकरीट भी हैं
तन मे लिपटा झाग फैन भी हैं
हो चुकी दूषित घनी देह भी हैं ।
दुख क्षण अति विवेक शून्य हैं
तिरोहित तन टूट बिखर जाता हैं
गुंजाइश फिर उठेंगे रहती नहीं हैं
हार केवल हार चित्रमय रहती हैं ।
कैसे करें क्या करें हम उपाय कोई आता नहीं हैं
सहारा कहां कोई अपना भी पास आता नही हैं
दुश्मन बहुतेरे नये नये प्रतिशोध पर उतर आते हैं
कातर शिथिल होता मन बैबसी के नीर बहाता हैं ।
दुख हैं घना हम क्या प्रतिकार करे
बौध रहा नहीं अब क्या उपाय करे
मिट जाते भी नहीं किसे याचना करे
दुत्कार प्रतांडना के तीर चित हैं भरे।
निर्लज्ज हैं प्राण भी छोडते नहीं देह को
कसक टीस वेदना की लहरें घेरे चित को
आग सी चिंगारियाँ दौड़ चीरती देह को
मूक हो निहारता चित प्रकृति के खेल को।
काली कालिमा लिपटी कठोर काल दुख लेकर आया
गहन घातक काल लगता अंधकार अटल राज लाया
प्रकृति का काला चेहरा भयावह रूप धर साथ लाया
खार क्रोध विध्वंस लक्ष्य काल क्रूर पूर्ण करने आया।
रे मन बता कौन देगा साथ तेरा
तू मरे जीये कौन हैं रक्षक तेरा
तू ही हैं सोच ले हित कैसे तेरा
निखरे बिखरे सभी मे हाथ तेरा।
सत्य जीवन का केवल सार यह हैं
दुख काल भुगतता व्यक्ति खुद हैं
संघर्ष या समर्पण निर्णय स्वयं हैं
निष्कर्ष तदानुसार मिलता जीवन हैं ।
दुख पाये यदि झुकता जीवन तिरोहित करता हैं
सुख पाकर इतराता जीवन धोखा स्वयं लेता हैं
सुख दुख दोनों तीर जीवन सरिता आते जाते हैं
मोहित प्रभावित इनसे जो भी होता गर्त गिरता हैं ।
असीम वेदना की मार से पीटा हारा हैं जीवन
करुणा के राग से भीगा घना कंपित जीवन
वासना की राह घना भटका पराजित जीवन
अतृप्ति की आग से झुलसा हुआ विकृत जीवन ।
भोग संग रोग को भी भोगता अहं धारक जीवन
लोगों को प्रलोभन देकर ठगता दगाबाज जीवन
अपनों को दुख मे तिरस्कार देता निर्मम जीवन
स्वार्थ गर्त मे डूबकी लगा संप्पति घेरता जीवन ।
प्यार मे भी स्वहित साधता बेवफा रहता जीवन
झूठ के धरातल खड़ा सत्य का हिमायती जीवन
अस्तित्व की चाह मे निष्कृष्ट पकडता राह जीवन
निर्धनों का हक छीनकर सुख भोगे घृणित जीवन ।
धर्म का मर्म जाने बिना दम भरता दिव्य जीवन
कर्म खोटे पर श्वेत आवरण लुभाता जग जीवन
मर्म विधा जाने बिना ही वक्ता महान बने जीवन
मानव मर्यादा त्यागा हुआ घूमता सभ्य जीवन ।
माल खाता हैं जिसका उसी को दंड देता जीवन
खुद हार का भी निमित्त ओरो को बनाता जीवन
मद ऐंठ मे कृश जनो को रोंदता शानदार जीवन
प्रकृति विपरीत कृत्य कर करता समझता जीवन ।
जीवन का राग विषम गहरा हैं
गायक कंठ लय खरोंच बना हैं
विवेक यही कुंठित हो गया हैं
यह गाया अनगाया रह गया हैं ।
सुख दुख हैं जीवन आँख मिचौनी
लौकोक्ति चली हैं खूब जगत जानी
रात दिन सम उपमा दी कवि बानी
जाना जब आया जीवन नहीं मानी।
सत्य वहीं नित्य हम जीते हैं
असत्य वहीं जो मन करता हैं
सत्य वहीं नित असीम रहा हैं
असत्य वहीं अस्थिर कहता हैं ।।