उद्देश्य मेरा नहीं
टूट कर बिखर जाना
कि हर कण अस्तित्व का
रौदा जाय
प्रतिरोधियों द्वारा क्रूरता से
होता हैं यह
जब मैं बन जाता हूँ खंडित
भीतर से
नहीं प्रकट होता बाहर बाहर
पर अंतिम सत्य यही
कि टूटने का कारण मेरा
कोई ओर नहीं
स्वयं मैं जब लडता स्वयं से
भीतरी द्वन्द तौडता जाता मुझे
अच्छे बुरे विचारों का संघर्ष
भीतर ही भीतर
जिसमें आखिर दोनो ही दशाओं
शक्ति लगती मेरी अपनी
ओर उसी पल हो जाता दो फाड़
हर बुरे विचार का विरोध
करता भीतर
ओर मैं बंट जाता दो हिस्से
ओर यही से शुरू हो जाता
स्वयं का टूटना
आखिर सत्य केवल यह
बुरे के त्याग से ही
हो सकता हूँ मैं विखंडित
जीना होगा जीवन सच्चाई भरा
यही उपाय कि जीया जाय जीवन
शात्विक अखंड ।
छगन लाल गर्ग ।