Friday, May 6, 2016

मेरी मुक्ति ।


झंकझोरता जाता हूँ
खुद को कि जगू भी
घनी गहरी तंद्रा आलस भरी
मन करता सोया रहूँ
मात्र यही गरज कि देखूँ
संसार का फरेबी प्यार
बड़ा छलावा
मोहाशक्त करता देता संकेत
कि रिझा रहूँ
जहाँ मैं हूँ वहीं उपलब्ध
गहन वासना के विभिन्न बीज
ढूँढते हैं धरातल
अंकुरित होने निमित्त
ओर मैं
विमोहित आबद्ध हूँ तुमसे
नहीं मुक्ति का ओर उपाय भी
भीतर की चिल्लाहट
हो उठी प्रबल
खटखटाने लगा द्वार
चेतना के
बाहर बाहर भीतर के बंद किये
क्या हो
असमझस नहीं समझ रहते भी
करता रहता मंदिर मस्जिद जाकर
बुलंद बकवास
कि प्रभु मेरे खोलो द्वार चेतना के
कि मुक्ति मिले तंद्रा से
ओर यह अभिनय बेखटके चलता
हर मंदिर हर मस्जिद हर गुरु द्वारे
स्वयं चेतन मंदिर का
कपाट युगों से बंद कर
पाना चाहता हूँ मेरी मुक्ति ।
छगन लाल गर्ग ।