Saturday, May 7, 2016

बौझ नही यह ।

मत ढोना
अवशेष बौझ की तरह
अपंग नही हो तुम
कारण समझ आने लगा
धीरे धीरे
केन्द्र नही देता स्वीकृति
अपंगता की
सत्य यह कि कृशकाय हुए
वह नही रहे जो दिखाते रहे अबतक
तुम्हारा बल पराक्रम शारीरिक क्षमता
ओर भौतिक कामयाबी का सच
नही भराव रहा तन ऊर्जा
पर इससे क्या
भीतर तुम बन चुके अधिक सक्षम
परिपक्व हुआ अनुभूति का सत्य
ओर समर्थ
ऊर्जा का बंटवारा नही रहा अब
शक्ति संचयन मात्र केन्द्रित अदृश्य
सूक्ष्म चेतना मे
अब अधिक सुविधा भरा अंतिम काल
नही बोझ जीवन
शरीर के बन चुके अब हम साक्षी
ओर प्रभु प्रार्थना काल अब अधिक सुखद
रसवान ओर आकृष्ट करता
अनंत ऊँचाईयों का निर्मल पावन चेतन
अमिट ओर नित्य सौंदर्य
बौझ नही अलौकिक वैभव ही तुम्हारा
अवशेष काल जीवन का
इसे मत कहो लाचार बुढापा ।
छगन लाल गर्ग ।