बेचैन नही
हर शब्द प्रयुक्त होने
नही गरज उसे अभिव्यक्त हो
प्रसिद्ध होने निमित्त
बलात्कार भाषा से हो रहा
निरंतर विद्ववता प्रामाणिक हो
ओर उभरते रहे
शब्दों के मानक अपने बन
विचार श्रृंखला देती अर्थ
शब्दों को शब्द नही
जरूरी यही
अभिव्यक्ति का स्वर
शब्द सतत नही चाहता
ऊँचाई की पृष्ठभूमि
पर सत्य यह
वही से उकेरे शब्द पाते वर्चस्व
बिना अहमियत अपनी
शब्दो का अपना महत्व
अधिक ऊंचाई से
मतलबी प्रयोग वस
आम जन मे नही रहा शाब्दिक
अर्थ या कि महत्व
अच्छा होता प्रकृति प्रदुषण से मुक्त
रखे जाते शात्विक ईश्वरीय
अवबोध के अन्वेषक
दिव्यता देते शब्द
मैलेपन की मार से धुमिल
मत करो
चमकने दो उन्हे अपने मौलिक रूप ।
छगन लाल गर्ग ।
हर शब्द प्रयुक्त होने
नही गरज उसे अभिव्यक्त हो
प्रसिद्ध होने निमित्त
बलात्कार भाषा से हो रहा
निरंतर विद्ववता प्रामाणिक हो
ओर उभरते रहे
शब्दों के मानक अपने बन
विचार श्रृंखला देती अर्थ
शब्दों को शब्द नही
जरूरी यही
अभिव्यक्ति का स्वर
शब्द सतत नही चाहता
ऊँचाई की पृष्ठभूमि
पर सत्य यह
वही से उकेरे शब्द पाते वर्चस्व
बिना अहमियत अपनी
शब्दो का अपना महत्व
अधिक ऊंचाई से
मतलबी प्रयोग वस
आम जन मे नही रहा शाब्दिक
अर्थ या कि महत्व
अच्छा होता प्रकृति प्रदुषण से मुक्त
रखे जाते शात्विक ईश्वरीय
अवबोध के अन्वेषक
दिव्यता देते शब्द
मैलेपन की मार से धुमिल
मत करो
चमकने दो उन्हे अपने मौलिक रूप ।
छगन लाल गर्ग ।