अस्मिता का संघर्ष
करता रहता मन मेरा
ओर इसी कारण
नहीं पाया आज तक सत्य
कि कहूँ साफ साफ
यह भोगा अनुभूत सत्य
स्वीकार करो
नहीं कह सकता
निरंतर अपना अस्तित्व बचाने
ओर क्षण की पहचान बनूँ
यही रहा प्रयास रहा
ओर इसी खातिर समर्थ के हाथों
बिकना पड़ा कई बार
रखना पड़ा अपनी अस्मिता को
स्थगित पैरों तले
ओर तब कहीं पा सका दर्जा
कि हूँ समझदार
जानता हूँ दांव पेश जीने के
ओर इसी कारण
समान दर्जे के साथ पा सका
विशिष्टता
कारण इतना सा
क्यों नहीं आता समझ
निर्बल लोगों को
कि रूतबे ओर अस्मिता के लिए
बिकना पडता हैं
समर्थो के हाथ
ओर तब पाती है तरावट जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।