राह मेरा कंटकित हो गया हैं कर पद शिथिल हो गये हैं ।
मनोबल कमजोर हो गया हैं जीवन जडमय हो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सूखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
जब तक तन मे प्राण बसे हैं थोड़ा सा भी बल बसा हैं ।
नैनो मे उजास बसा हैं तेरा ही दिल आकर बसा हैं ।।
पीछे की पीड़ा घनी हैं आगे की कैसे जान बताऊँ।
विरह की छांव घनेरी मिलने की कैसे आस बताऊँ।।
जिसे मैं समझा था मधुरस रस रूप मद भरा जीवन ।
वह सत्य मे था कटु विष तृष्णा से भरा मोह आँगन।।
करते करते पूरा न मिला चलते चलते घर न मिला।
मन मन खोजा पर न मिला मनभरा कहीं साथ न मिला।।
हताशा तुझे मैं खूब जीया कतरा भर तो रोशनी मिले ।
निराशा तूने मुझे घेर लिया अवशेष जीवन कुछ तो खिले।।
अंधेरा घना दिखता नहीं खुली आँख पर रोशनी नहीं ।
कदम विवश बढ़ते नहीं उलझन घनी मिटती नहीं ।।
कठोर जीवन बोझ बना धाराऐं हिमखंडा बना ।
भंवर सा अस्तित्व बना जाल बहुतेरा घेरा तना ।।
झकड गया इस जाल मे अब
समझ न आये चाल भी जब
रूकता नहीं मन भ्रांति से अब
चेतना जडवत चुप हो गई अब ।
चल अकेले चल जीवन वेदना का ले सहारा।
एक अनमोल सार सारा कभी न समझ बेसहारा।।
गति न पाये चाहे जीवन बेसुध रहने दे रे मन।
एक कतरा तेज टीम टीम चमक सकता हैं चमन।।
विरह मे ही बिराजे परम पारस नाथ मेरे ।
वेदना से वेद सारे बोझ भर दे सुख सारे।।
नीर सा सजल बन गया हूँ
जीवन की बाजी हार गया हूँ
सार जीवन तेरा जान गया हूँ
असली भेद अब समझ गया हूँ ।
वासना आग्रह चला गया हैं
सुंदरता मोह रहा नहीं हैं
प्रेम विरल बन बह गया हैं
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।
छल कपट नयनो से गुजरा तब भी आस्था मन छोड़ न पाया।
दिल की अस्मत विरल लुटी घायल मन कुछ कर नहीं पाया ।।
लोभ मतलब व्यापार जीवन कामना विस्तार जीवन ।
झूठ फरेब शान जीवन विश्वास का हत्यारा जीवन ।।
छलनाओ का चक्रव्यूह बन घेरे हुए हैं हमें निरंतर ।
बच सके तो निकल भागे ऐसा कोई ठौर हैं न घर ।।
जिसे हम समझते अपना हमारी विपदाओ का मूल।
करें उपचार हम कैसे मन की संवेदन दशा अनुकूल ।।
ओर खाते चौट गहरी अनत्व भाव होते जाते खंडित ।
कह न पाते आपबीती हृदय चौट खाया रहता कंपित।।
आप जाना आप भोगा ओर किसी की बात नहीं ।
कपट छल का स्वाद पाया विधि को स्वीकार यही ।।
यह जीवन का इतिहास सूनेपन का ही विस्तार ।
सकल तृष्णा का विकास जीवन उठाता वृथा भार ।।
नाविक मुझे ले चल दिया हैं ।
आहिस्ता से यह नाव चली हैं ।
निश्छल प्रेम संकेत मिला हैं ।
गागर मे सागर भर गया हैं ।।
नभ लालिम बन गया हैं प्रेम रस अब छितर गया हैं ।
मुस्कान आभा छा गयी हैं रे हमें बुलावा आ गया हैं ।।
तट रूक जाना कैसे होगा दीदार अवसर आ गया हैं ।
प्रेम विरल बन बह गया हैं सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
जग विस्तृत जन विस्तृत घना हैं विस्तार इसका।
नजर जाती विस्तृत पर जब नयन रख पाना सबका ।।
एक अविरल हार मिलती तृष्णा कृपण थक जाती।
मोह का भटकाव ढूँढता एक दुनिया डूब जाती।।
आँख सपने देखती तब उतंग मोहक मंजिल मिले।
मधुर मधुर कामना जब सुंदर सुहाने वैभव मिले ।।
हुलसता किल्लोल करता मनमोहक परिवार मेरा।
स्वर्गरस सा सुख भौगता तब अलौकिक परिवार मेरा।।
कौन ऐसा जी सका हैं वेदना के राज तम मे।
माया की शीतल छाया आगोश सूख छांव मे।
पी रहा अब मैं हाँ पी रहा रसमयी मादक मदिरा को।
मधुर मधुर मन लहरे उठती करती उन्मादित मौसम को।।
आह यह क्या तू अचेतनता तेरा कितना मादक संगीत ।
स्वर लहरी तेरा राग अनुपम मुग्ध करता गगन विश्रान्त।।
सुख आओ सुख घनीभूत रहो अतिवृष्टि की लहरों सी।
धूप विहीन संसार हो मेरा कामनाओ की सुंदर श्वासों सी।।
वक्त का प्रवाह कैसा कोई हैं जो समझ पाये।
आगमन ऐसा हैं उसका अज्ञात मेहमान आये।।
प्राण भंवर मे फस गया हैं रास्ता धुंधला गया हैं ।
पार पाना रूक गया हैं फासला अब बढ गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
हैं प्राण पर जीवन कहां हैं ।
हैं राग पर स्वर रस कहां हैं ।
हैं झील भरी गहराई घनी हैं ।
चंचल उतंग अब लहरे नहीं हैं ।।
थोड़ा सा भी स्पंदन होता जो तन मे हरकत भरता।
काल पार थोड़ा सा जीवन जुडता कहीं नजर न आता ।।
आर पार का सच्चा तन मन जैसा हैं वैसा ही दिखता।
बना संवारे बोल सकूं मैं इतना सयानापन कैसे आता।।
असीम तर्क उलझने हैं कैसे कोई पार पाये।
जैसे जैसे प्रयास करते ऊलझने बढती जाये।।
धागे सा उलझा गुंफन हैं जीवन सरल बन पाये कैसे ।
तरल सा कोमल हृदय कठोर घेरे से निकले कैसे।।
पार जब भीड़ देखती हैं काल फिर लुका छीपी खेलता हैं ।
सपने सटीक रूप लेकर मोह रस रूप सुंदर डोलता हैं ।।
टाल टूक लूट पाट जीवन डाल डूब जाये जड मानस।
ठौर ठावक छल भरा जीवन पाल ललना लूटपाट ठावस।।
हार हरदम हासिल होती चाल चंचल नाकाम होती।
कदम थके झूठा बनाती चेतना बदहाली भर देती।।
छा चुका भयंकर अंधेरा पार निखिल पा नहीं सकूंगा।
जा चूका जीवन सवेरा आस सुखद पा नहीं सकूंगा।।
रहता हूँ अब रहने दे चलता हूँ अब चलने दे।
जीया जाये जीने दे ढाई आखर पाने दे