Friday, May 20, 2016

आते'''''।


कल मेरा होगा विश्वास नहीं
अस्तित्व आज अभी हैं सही
कौन आबाद रहेगा कहता नहीं
कौन नाबाद रहेगा कहता नहीं ।
सब कुछ तो हैं फिर उदास क्यों हो
आसपास यातना देख समझे नहीं हो
घडा तुम्हारा रीता हो जाता क्यों कहो
लेने वाले दर खडे पर देने आते क्यों हो।
विवेक मेरे क्या तू जीने देगा
ममत्व क्या तू कभी मिटेगा
कसक पीड़ा छोड जियेगा
सार संसार कभी पायेगा ।
न तो तुम सपने देखते हो ओर न मैं भी
न तो मुझे समय सोने का ओर न तुम्हे भी
न मेरे खर्च कमाई से पूरे होते न तुम्हारे भी
बिना नींद मैं कैसे सपने देखूं ओर तुम भी।
ऊँचे भवन बहुतों के बन चुके बन रहे हैं
विकास गंगा रात दिन बह चुकी बहती हैं
हमने वे बनते ये बहते हमेशा देखी देखते हैं
कैसे बने ओर बही न समझे न समझते हैं ।
अरे तू बडा अनजान गंवार लगता हैं
क्या किसी गांव मे रहकर आया हैं
पटखनी खेल वहां भी लोकप्रिय हैं
शहर आया वहीं खेल सभ्य हुआ हैं ।
भाई दशा देखी हम तुमसे द्रवित हुए हैं
कुछ कहेंगे फिर करेंगे हम मददगार हैं
कामधन्धा देंगे गुजारा भी देंगे काम हैं
केवल कुछ भी काम दे करो तो मंजूर हैं ।
काम अभी नहीं कह सकते हम कहा न
मंजुर करो कोई भी करवाऊं मैं करोगे न
पगार दूंगा खाना दूंगा काम पर रहोगे न
झूठा सच्चा जो भी बोलू काम करोगे न।
क्या आचरण का मापदंड बदला बदली करता हैं
क्या जीवन कमाया पुण्य काम किसी के आता हैं
क्या हम रहते जीवन कुछ सहृदय भाव अपनाते हैं
क्या पराश्रित रहते निक्कमापन ही हम अपनाते हैं ।
हर जगह समन ही हो यह जरूरी नहीं
दर दर ठोकरे ही मिले यह जरूरी नहीं
कर्म करे विश्वास से फल जरूरी नहीं
फर्ज मानवता निभाये भाव जरूरी नही ।
दिन भर काम से फुरसत हमे कहां
रहते रात दिन हम धंधा जमे वहां
करते काम निकला हैं जीवन यहां
लगाव काम साथ लोगों से ही रहा।
कहते कहें वहीं हम साथी हैं मददगार
रहते दुख सुख मे मिलकर हमसफर
रहता आपस मे रिश्तों मे बड़ा प्यार
जिन्दगी का ऐसा अनुपम हैं व्यापार ।
जीये प्रेम रहे प्रेम करें सभी को बेहद प्रेम
भीगे नयनों का सहारा बनें रहे यहीं काम
बड़े हमारे हमसे नित्य आशा रखे तमाम
करो सभी को जीवन मे विनीत हो प्रणाम ।
जब तक तुम झुकते नहीं मानव कहना ठीक नहीं
जब तक तुम दर्द सुनते नही सहृदयता आती नहीं
जब तक सहारा बने नहीं व्यर्थ रहा यह जीवन नहीं
जब तक पीर गरीबी जानी नहीं हृदय रखते हो नहीं ।
पूरे हो कैसे ख्वाब तेरे
खार क्रोध हथियार तेरे
प्रेम का हिसाब चित तेरे
शीतलता कैसे हो मन तेरे ।
सबकी मैं सुनता तो रहता हूँ
सुनी को फिर गुनता रहता हूँ
गुनी को नित सबको कहता हूँ
सब अहंकारी कहें मैं ढूँढता हूँ ।
बोझ नहीं माँ ममता का इम्तहान हैं
भरोसा अपने का रहे यही परख हैं
काल किसी को ढील देगा ख्याल हैं
काम ही काल का परिणाम सत्य हैं ।
जीवन मेरे कोई शिकवा तुझसे नहीं बहुत दिया
औकात कहां थी मेरी संभ्रांत जनो मे तुझे जिया
माहौल कहां था मैं दम तेरे कुछ पढ़ लिख लिया
कर्म क्षेत्र भी तूने मुझे शिक्षा कर्म करने को दिया ।
आज फिर कहीं भ्रमित होकर जीना चाहता हूँ
खामोश रहते फिर नया नजारा तेरा चाहता हूँ
बिता जीते जीते ऊबा हुआ खुद दुर्गंध दे रहा हूँ
वर्तमान आज कुछ नयापन दे उसे चाहता हूँ ।
कल तुम आये तब कितना नमनीय दिखते थे
बात बात पर कैसे मुझे संघर्ष राह दिखाते थे
सलिका जीने का कारगर बने कैसे कहते थे
आज मायूस थके से हो क्या कल तुम्ही थे।
हमारा तुम्हारा करते करते मैं पड़ाव कगार आया
आना जाना चलते चलते थकान ले शरीर आया
घर पर घर भेद खूब किया अब भेद नहीं भाया
मालिक बने फिर नचाया नौकर खुद भेद पाया।
रो ले मनवा कर राम भरोसा
खो दे झूठा जगत विश्वासा
रख रे हिये मे तू राम भरोसा
उतरे सागर पार रख आसा।
नरम नरम स्वभाव ज्यादा ही हुआ हैं
करम धरम का ठहराव क्रियाशील हैं
जागरण कहूँ क्या नया समय आया हैं
विचारों का बिखराव संग्रहित हुआ हैं ।
मेरे भी लगते पराये भी सत्य हो
तेरे भी अरमान पाले जो सत्य हो
अपने पराये का फर्क भी सत्य हो
जीवन दर्शन दिखे कभी सत्य हो ।
घेरा मानव का विस्तृत नित बढ़ता
फेरा तो मानव जीवन का नित रहता
डेरा तेरा रहे कब तक तू कैसे कहता
गेरों का रहे कोई कब अपनों मे रहता।
सपने अपने पूरे होते गर तुम वफा निभाते
मंझधार मे छोड़ा पास रह कोई सजा देते
बहुत दर्द झेल चूके कोई अनजान दर्द देते
जीये किस आसरे कुछ समझाते फिर जाते।
लेते जाते देना सर्वस्व चाहा क्यों नहीं लिया
संताप छोड़ के तुम्हारा दिल संतोष से जिया
भौर संध्या अब मिले जीये कैसे संतप्त हिया
झेले कैसे तुम हो नहीं केवल दर्द आपने दिया।
बार बार आकर मेरे प्रिय भाव क्यों दे जाते हो
भार घना पीड़ा का मेरे हृदय तले भर देते हो
उठा पाऊं बोझ मे कैसे संकेत भी छीनते हो
ऐसे कैसे जी पायेंगे हम बोझ घने दबा देते हो।
अब मत कहना छल नहीं हैं
विडंबना जीवन धन नहीं हैं
काल विकराल आया नहीं हैं
विपदा घिरा हृदय तो नहीं हैं ।