बडा असमंजस रहता
स्वयं का
क्या संचित व्यक्तित्व हूँ मैं
जानते सब उसी तरह
मेरे मन कुछ बता
तू क्या कैसे बना
मेरी उपलब्धियों का योग तो नही
शिक्षा संस्कार ओर आचार
मिलकर तो नही तूँ
यह साबित हुआ
तूँ बडा पंगु हर बार
जब कभी आती जीवन इम्तिहान की घडी
तूँ हो जाता बेकाबू
नही रहता वश मे
भागता दौडता सहारे की तलाश
सच कभी नही पाया मैंने
कि तूँ से रहा हो साथ
डरपोक ओर स्वार्थ भरा अस्तित्व तेरा
हर बार हारा बाजी जीतने लायक
केवल तेरे भरोसे ।
छगन लाल गर्ग ।
स्वयं का
क्या संचित व्यक्तित्व हूँ मैं
जानते सब उसी तरह
मेरे मन कुछ बता
तू क्या कैसे बना
मेरी उपलब्धियों का योग तो नही
शिक्षा संस्कार ओर आचार
मिलकर तो नही तूँ
यह साबित हुआ
तूँ बडा पंगु हर बार
जब कभी आती जीवन इम्तिहान की घडी
तूँ हो जाता बेकाबू
नही रहता वश मे
भागता दौडता सहारे की तलाश
सच कभी नही पाया मैंने
कि तूँ से रहा हो साथ
डरपोक ओर स्वार्थ भरा अस्तित्व तेरा
हर बार हारा बाजी जीतने लायक
केवल तेरे भरोसे ।
छगन लाल गर्ग ।