Tuesday, May 24, 2016

आते @@@


भाई संभलकर बोलो निवेदन से क्यों खोलो
बेहोश हो क्या जो डोलो इस तरह हमें मत तोलो।
आने का कहा तो हैं चिंता ना करे अपने हैं
बिमारी मे मदद देते हैं आज कर्ज भी सेवा हैं ।
मत कहो बिकाऊ क्या केवल हम हैं
बडे भोले हो अरे अच्छे भले बिकते हैं
भाई हम तो फिर भी नीति से बिके हैं
बड़े से लाट तो रात दिन यही करते हैं ।
दाव लगा आप गाली क्यों देते हैं
हारना हम भी कब क्यों चाहते हैं
सुबह से भूखे दम रहता कहां हैं
अब क्या करू हम तन धन हारे हैं ।
चिंता से हर पल घिरता रहा हूँ
कभी जोर लगा उसे तोडता हूँ
कभी विद्धवानों के तर्क रखता हूँ
कभी उपजे विवेक को देता हूँ ।
कुछ समय के लिए चिंता मिटती अहसास हैं
विचारों के समूह जाल जब उसे घेरने लगते हैं
टिकते उसके सामने पल तक चिंता जीतती हैं
दुगूने वेग से विशाल आकार ले हृदय घेरती हैं ।
करता जाता हूँ चिंता जितनी
विशाल विस्तार पाती उतनी
हृदय गगन आँधी गर्जन ठनी
भयभीत हैं प्राण विपदा घनी।
कौन कब कैसे संत्राण देता
हर किसी का संताप कहता
प्राण सिसकते विराग रहता
भावना विनष्ट रक्त राग बहता।
खोल दे जीवन भेद अपने
बोल रागिनी तू राग अपने
डोल किस्मत जोड सपने
आज कुछ हो सके अपने।
जितना पाया उतना ही गवाया
कितना ही सारा व्यर्थ गंवाया
बितता उतना जितना कमाया
फिर भी सिर पर कर्ज चढाया।
अब क्या हैं कहे बिना कहे ही रहे
उदासी नित रहे यही जीना कहे।
भरे हुए लोग भी कहीं होते होंगे
तृप्ति के अहसासी भी कहीं होंगे
रेत से शुष्कता गिलापन सिखेगे
धराशायी कैसे उठे सीख लेंगे ।
तुम क्यों कहते कि मैं आजाद हूँ
मैं ऐसा कहने से ही झिझकता हूँ
डरते बिता जीवन सच कहता हूँ
जिम्मेदारी सभी की रखता हूँ ।
ढेर सा सब्र जीवन मे गति कैसे लाता हैं
गैर का दर्द हृदय हमदर्दी क्यों लाता हैं
फेर दिनों का हमारी पहचान बदलता हैं
मैल दिलों का समय रूख बदलता हैं ।
अनुभव अगर सीख देते तो संभल जाते
करूणा क्रिया करती तो दुख क्यों आते
खंडित विचार कभी प्रभावित नहीं होते
सागर टूटे बिखरे पर नदियाँ कहां लाते।
कई बार मेहनत परिणाम सुखद नहीं लाती
हम मेहनत से ही पीछे रहे हैं थोडे जजबाती
सच्चाई के रास्ते आगे बढने के हैं हिमायती
देख चुके मंद बुद्धि साथी बने हैं सियासती।
मधुर मधुर तारो का नर्तन मन भाया
काली चितरी कालिमा का घनछाया
चिर झंकृत सितारें संगीत मनछाया
मंडल मंडप लावण्य नाच नचाया।
नीरव नीरज कुसुम टीम टिमाये तारे
भीतर मंथन सुख गागर रसमय सारे
मादक थिरकन बदन सुंदर काम मारे
राग की गागर बहे चित सुंदर परनारे।
ठंडक देती पवन के चित झौके
भड़क उठी रे मन ज्वाला रोके
कडक हैं चित चंचल नैन झरोके
लागी अग्न भीतर की कैसे रोके।
सिंगार अलौकिक रूप सलौना
तन भरा कसावट चित करे खोना
मद मार रहा हैं जीवन हुआ बौना
सब छोड संग तेरी चाहूँ मैं खोना।
तुम गर आते अच्छा लगता
पास का होने से जी भरता
तुम्हें ऐसा क्या नहीं लगता
सच कहता हूँ अब तडपता।
आराम क्या इसे कहते हैं
लेटे लेटे भी खालीपन हैं
सुखद बिस्तर बेचैनी हैं
मस्तिष्क विकार भरा हैं ।
बिम्ब साकार क्यों होते जाते हैं
तन्हाई माहोल बिखरता कब हैं
अमूर्त मिथ्या खुद सच्चाई हैं
पर सत्य इसे नित काटता हैं ।
वहीं बात जिससे हम भयभीत हैं
तुम जानते हो वहीं क्यों होती हैं
बसते उम्र भर रहे होती रहती हैं
उपाय किये परिणीती होती ही हैं ।
समझाइश आपने भरपूर की कर सकते
बाकी क्या रहा जो मुझे करने को कहते
दिल का मामला बेढंगा लोग हमें समझाते
वहीं समझ मेरी हैं फिर क्या उसे कहते ।
मैं छोड़ देता हूँ क्षमा कहता हूँ
पल ही पला हूँ फिर बिखरा हूँ ।
गहरी हो संवेदना चाहिए
टीस पीर निदान चाहिए
पकडे वेसे जाल चाहिए
डूबा रहूँ प्रेम झील चाहिए ।
मकसद मंथन मस्तिष्क मेरा
झकडन कंचन भंडार घनेरा
चितवन नयन उन्माद वसेरा
धडकन भीतर रसभरे घनेरा।
दिल उदास पराया होता हैं
मिले दिल पराया अपना हैं
बड़ी बेसुझ जिन्दगानी हैं
अपना पराया प्रेम मिले हैं ।
सुंदर कुरूप शब्द क्या सार्थक होते हैं
हैं तो अपना मापदंड स्थापित किये हैं
नहीं फिर किसे शब्द दे जहां सच्चाई हैं
सच्चाई पेमाने आशक्त मन गढता ही हैं ।
हारे हुए मुसाफिर थक कर बैठे रहना पडेगा
यात्रा तेरी अधबीच रखे ही मन मारना पडेगा
सहारे किसे मिले मायूस होकर देखता रहेगा
हंसते गाते कारवाँ जिन्दगी का निकला करेगा।
जाइये हमे छोड कहां जाएंगे
मन लेकर जाते हैं चैन पाएंगे
रास्ते चढान के साथ लाएंगे
हारे दिल मे फिर हमें पाएंगे।
तुम कमजोर क्यों रहते हो
क्या तुम चिंतित किसी से हो
सच परायों के पीर द्रवीत हो
अपनो की कद्र कब रखते हो ।
जल्दी करो अब शाम भी आ गई हैं
अब थके हारे पंछी घौंछला चाहते हैं
आप राह रूके फिर साथी कहते हैं
रात के अंधेरों से पीछा छुडाते हैं ।
थकान एक हकीकत हैं
स्वीकार करना विवेक हैं
उड़ान कर्म जीवन का हैं
विश्राम थकान गेह सार हैं ।
अब चलूँ फिर मिलूँ
तब बोलूँ भेद खोलूँ ।
रात आने दो डर जाने दो
दिन सपने दो बल भीतर दो।