लाभ हानि का जोड जीवन जरा मरण का सार जीवन ।।
करू कैसे कमनीय करनी चलूं कैसे पतली गली घनी ।
रहूं कैसे राखनहार से तनी जीऊं कैसे कसक हैं घनी।।
भार झेल बीदक गया हूँ मार मारक थक गया हूँ ।
भंवर भारी फस गया हूँ पांव पसारे गीर गया हूँ ।।
धडकने धीमी हो गयी हैं करूणा कातर हो गयी हैं ।
गिरा कठोर हो गयी हैं सारा जहां बौझिल हो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूस्थल देह रह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ जड देह रह गया हैं ।।
दुनियादारी दौर चल रहा हैं
जरा का जोर झकझोर रहा हैं
काम कामना कपट काट रहा हैं
पाप पकडता पुण्य भाग रहा हैं ।
रात रोधक रोशनी नहीं हैं
काल कर्कश कठोर रहा हैं
अजनबी अजय रूप रहा हैं
भाव भूले भटके जी रहे हैं ।
तार टूटे तटके संगीत सूना रहा हैं
राग रंजन रागिनी सूनी हो गयी हैं
लाल लौचन लालिमा नीर खो गया हैं
तन तनाव मय तार वीणा टूटे पड़े हैं ।
फफक फफक फलक हीन सार
भटक भटक दारूण ठेस अपार
बहक बहक होश बहुत कसकदार
टपक टपक नीर न हैं रोकनहार ।
छिटक रही तपन वहीं लिपट रही पीर वहीं ।
निपट भ्रम रोंप रही सिमटी रसगागर यही ।।
सपने सपने चाह बढी लडते लडते कुंठा कुढी।
आर पार मन की मुढी रही रही केवल बूढ़ी ।।
तन कसावट जर्जर जर्जर मन चंचलता मंझर मंझर।
नैन बिलखते निर्झर निर्झर बदहाली हैं हर डगर डगर।।
पंछी उड उड उड़ान अकेले पंथी संग न रहेंगे पहले ।
डाल डाल पर कंटक कटिले छाँव ठौर नहीं रही पगले ।
ललक बसा छल जल ही पाया
महक मोह फस जाल ही पाया
रस रोचक घुल खार ही पाया
मन माफिक खा जहर ही पाया।
सुंदर सुंदर लावण्य मद भरा कुन्दन कुन्दन तन रस भरा।
मादक चितवन नेह घनेरा वहीं आज बना काल का घेरा।।
माया तेरी मटक मनमोहक काया तेरी चटक चितहारक ।
नैनो का तिरछापन आकर्षक छलावा बड़ा होता घातक।।
डूब गया हाँ डूब गया मैं तृष्णा घिनोने तालाब में ।
कीचड़ भरा तन लेके मैं धोने दौडा हूँ अब सागर मे ।।
घने बियावन भाग रहा हूँ राह सागर पाता नहीं हूँ ।
राही पारखी छोड़ चुका हूँ पगला गया भूला भटका हूँ ।।
कह दो हे मेरे जीवन कह दो
डोलूं भटकूं कितना कह दो
मददगार कोई हो तो कह दो
अपना पराया भेद खोल दो ।
कठोर कंकाल काल जायक कर्कश कलरव कूंठा दायक ।
कल्पित कोमल कौल मारक कमनीय करनी जीवनदायक ।।
धरम धारण धारा धारक धीक धौखा अधरम कारक ।
धडकने धडके धौये पापक धारणा धारे धन धारक ।।
टूटन टाली टले न टाले लूटन लौटे नहीं लेटे ठाले ।
झूठन झूठी निठ्ठल खाले सुजन अवसर कभी न टाले।।
भाग्य भरोसा भव मे भाया भला भला भुगते भव पाया ।
पर उपकार उपचार कराया परह छांव सुखदायक पाया ।।
जब लिया विवेक का सहारा तब केवल मतलब का मारा।
पशु सम विसरा फरेब धारा कोमल कपोल जीवन हारा ।।
ऊहापोह घन सम हो गया हैं भंवर राह गुम हो गया हैं ।
अंधकार गहनतम हो गया हैं उम्मीद जीवन खो गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूतल तन रह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ जड देह रह गया हैं ।।
कल तक जो मेरा अपना था मीठा मधुरतम जीवन धन था।
आज नहीं हाय सपने मे भी विकराल हैं मेरी घातक कथा।।
मेरी तेरी अजब कहानी सदियों से चली जुबानी।
हाथ रहे खाली के खाली संग नहीं हैं केवल बानी।।
यह आज समझ तो पाया हूँ वृद्ध तन कमजोर पाता हूँ ।
अवयव की ऐसी क्षीण दशा आई तो मन से हारा हूँ ।।
आती जाती श्वासों का किसने पाया लेखा जोखा ।
लिया किया कर्मों का विधि बांधती पूरा लेखा।।
पानी सा तरल हो जीवन लाली सा तन रहे खिला।
माली सा सार संभाल हो जग धन रहे फला फूला ।।
घर बार रहे सुख साज रहे अपनों का नित प्रेम रहे ।
जलजात सुरभि घेरे रहे नवजात कुसुम खिलते रहे।।
जग मे छाये आनंद घना पुण्य करे मानव बन घना ।
सबल संबल बने अनाथ जीवन रहे खुशहाल घना ।।
मन मर्म मर्मज्ञ ढूँढ रहा चित मोहित क्यों हो रहा।
अपनत्व का राग घूल रहा जीवन का अंग बन रहा।।
फिर सारा जीवन लग जाता हर पल कर्म उस हित करता।
नीजता का भान खो जाता सुखद हो वह सपने देखता।।
इसे अब नाम क्या दे मोह या कि नेह कह दे।
कर्म या कि धर्म कह दे भूल या कि समझ कह दे ।।
कहें तो कहना तोल कर कहना मोह कहना फर्ज कहना।
आशा सहारा साथ कहना जुड़ा जीव अब साथ रहना।।
जीने लगे हैं उसके लिए हम कर्म बढ़े हौसलो मे दम ।
नींद करना हो चुका कम बने सपना साकार हरदम ।।
ओर सरकता जाता जीवन आशाओं के पंख उडे मन।
भाव वहीं घनीभूत हमारे संसार सुखो का कीर्तिवन ।।
नाचो नाचो अब जीवन मेरे झूमों ऊछलों खुशी लूटो ।
हंसता गाता संसार तुम्हारा बहे सुख नद जी भर लूटों।।
झुमता इठलाता जीवन मेरा रस रसीला आम हो जैसे ।
भरापूरा परिवार हैं मेरा कामधेनु का वरदान हो जैसे ।।
काम केवल काम का लक्ष्य पूर्ण हो मेरे अपनों के लक्ष्य ।
जागरण मात्र जीवन लक्ष्य निराकरण मिले सपने हो सत्य ।।
बाधाऐ अब रोके कैसे मजबूत हौसले सबल हुए ।
यह फर्ज पूर्ण हो कैसे तन मन पूरे अर्पित हुए ।।
कलियां खिली फिर फूल बनी बगियां गुल से गुलजार बनी।
रस नयन सघन समा सनी नेह निर्झर मे मन देह सनी