Thursday, May 5, 2016

कबड्डी

हमारे बाल्यकाल का प्रसिद्ध खेल
आज नापसन्द गंवार घोषित
कबड्डी कबड्डी
बजा बजा कर रेत मे गुलटियां देते
नही घूँटने देते श्वास
श्वास शक्ति विलय पाकर बन जाती
जीत व्यक्तित्व की
अब नही होता यह खेल
देहाती स्कूलों के अतिरिक्त
शहरीकरण हो चुका
भावनात्मक आनंद का भी
अब तो क्रिकेट का जमाना
जिसमे माटी की पावनता नही
अस्तित्व अंकुरित नेह नही मातृभूमि
ओर बजती तालियाँ करती उद्घोष
विदेशी संस्कृति के संरक्षण का
बडा अजीब है युग का सत्य
अपनत्व भूलते हम
खुद जा रहे विलोपित करने अपनी
मातृभूमि की मर्यादित मान्यतायें
कब लौटेंगे मेरे संस्कृति के दूत
साहित्य कार अपने घर
नव पीढी मे मूल संस्कृति भरने ।
छगन लाल गर्ग ।