Tuesday, May 10, 2016

पीडा मेरी ।

तुझमें पाता हूँ मेरी पीडा
रसमय स्पन्दन दे जाते तुम
आकारवान हो जाता मैं
भरा भरा पीडा मय साम्राज्य पाकर
अधूरापन महसूस करता
जब तक नही मिलती तुमसे
कसक देती व्यथा
जानता हूँ मैं कि पाऊंगा तुमसे
जीने लायक कसक
कि डूबता रहूँ संपूर्ण समर्पित हुआ
ओर जोडता रहूँ टूटन के अवशेष
कारण का मर्म महसूस करता
भीगता रहूँ ताकि बन सकूँ नमनीय
द्रव्य सम बहने लायक
आकांक्षी हूँ शायद मेरे मित
चाह लिए
कि अनगिनत दर्द अंबार ढके मेरी प्रभुता
ओर जीवन का अहसास होता रहे
आखिर कौन मेरा
जो संवेदना का छाया बन
देगा शीतलता मुझे
नही शीतोष्ण रस सागर
अब जीवन मेरा
केवल बहाव का नीर बेकाम
जो चाहता केवल तुम्हारा अनुदान
मर्माहत करता दर्द ।
छगन लाल गर्ग ।