सुख उनको तभी सिसकते मिलतेहम हैं कहीं
रखडते गुजरे जीवन आनन्द उन्हें मिलता वहीं
भंवर फसाकर तमाशा देख सुख पाते वहीं ।
कल तक जिसके लिए रात दिन चिंता मे हम थे
आज तड़के हमें सीख देते हैं हम चकित क्यों थे
आज हमसे ज्यादा पुष्ट हो उठे तो हम भयभीत थे
जड़ सिंचाई से पेड़ दिखाकर तिरस्कृत उससे थे।
आते क्यों हो
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आते क्यों हो ख्याल गाफिल करते हो
भरते क्यों हो जीवन रीता दे जाते हो
आवाज दे कैसे गला रूंघा कर देते हो
प्राण रहे कैसे रूदन दरिया रोक लेते हो।
अबकी मेरे अपने बस इतना करते जाना
झपकी ले सकूँ आराम से कुछ दवा बताना
अपनी परायी या बाजारू मिले लेकर आना
किमत मिली पैंशन दूँगा कंजूसी मत करना।
जब घर पास रहते क्यों लगता मेरे हो
अब हर फेरा आते तो लगता पराये हो
कभी फुरसत मिले हमें भी संभालते हो
पर वह क्या धड़कन हैं जो खुद की हो।
सुंदर सपने देखे कब अपने बने सुना तो नहीं
अपने हुए सपने किसके बने ताउम्र देखा नहीं
भूल भूलैया जीवन सच जाना पर किया नहीं
मृगतृष्णा भंवर फसा जीव बाहर निकला नहीं ।
रात अंधेरी ही सही थोड़ी करीबी तो हैं
बात अधूरी ही सही पर शुरूआत तो हैं
गात जर्जर ही सही प्राण स्पंदन तो हैं
लात छलती प्राण पर खुद पनपायी तो हैं ।
सूट बूट तुम्हारे हमें चकाचौंध करते हैं
गुजरे जमाने की अभी तक याद देते हैं
लाख कहो सुधरे पर दिल तौड देते हैं
मुस्कराहट चेहरे से तिरस्कार देखते हैं ।