Monday, May 9, 2016

पढें ना होते ।

कास पढे ना होते
कमा खा लेते
निकल सकता अर्थ
बेअर्थ जिन्दगी तेरा
बडी तस्सली मिलती
कि कुछ लायक जीते
अरमानी भाव द्रव्य कम बहता
फिजूल का
केवल असावधानी वस
अन्यथा
जिन्दगी देती हमे भी
अपने होने का सबूत
अर्थ भरा
कितने अनुशासित थे
मापदंड हमारे
जब हम पढते
रात दिन अनवरत
झेलते रहते भीगी आँखों मे
नींद का सपना
ओर इसी कवायत होता रहा
हम पर बार बार आक्रामक
जब कम ले आते प्रतिशत परीक्षा मे
ओरों के मुकाबले
हमे जुतना पडता पुराने बेलों की तरह
पढाई की कठिन खेती में
रात दिन तपस्वी से जुते रहे पढने में
ओर हमारे माँ बाप बुनते जाते सपने
रात दिन जागते जागते
नही देती नीद सुनहरे सपने
नही आया काम
दर दर की ठोकर
बडी जान लेवा बन चुकी
बेरोजगारी
हताहत बेकार बदतर मूढ बना
आज नकारा बेअर्थ सा
अच्छी शिक्षा
अच्छे प्रतिशत का आँकडा
माँगता भीख
मजदूरो से बदतर यह जिंदगी
ओर अनपढ बनते जाते
प्रजातंत्र के सिपाही मंत्री
अपने तलुऐ चटवाने का काम भी
हमे नही मिलता
नही करते विश्वास शिक्षितों पर
शासकीय तंत्र
उनका भरोसा अनपढ वफादारी पर
जो बिना मांगे निभाते साथ
मत देकर
बहुमत आखिर उनसे ही पाते
ओर चमकदार जिन्दगी को अर्थ
केवल लोकमत से
शिक्षित बेअर्थ जीता अब जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग ।