चेतना के बोल
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हलचल कल कल बहे निरंतर
भगदड भ्रमित भरे रे अंतर
चेतन पल वस जगमग भीतर
आँख खोल छौर झलके अंतर।
हे मन इतना विकल हुआ क्यों
रे हर्ष इतना विगत हुआ क्यों
हे चेतन थका क्या लाचार क्यों
हृदय रे यह मन की बात हैं क्यों ।
रिमझिम बरखा बरसे हैं कहां
झिलमिल जलता दीप हैं कहां
जगमग प्रकाश फैला हैं कहां
छनाछन नेह स्वर लय हैं कहां ।
दीपक जला दिया प्यार का
आराध्य के सत दीदार का
चेतना जागरण श्रृंगार का
शरण रज बन सकूं चाह का ।
स्वीकार हैं हर हाल मिले तेरा
अंगीकार हैं हर दर्द गर हो तेरा
नसीबदार हैं हम छाया हैं तेरा
लगी जीगर हैं गर दर्द छूपे मेरा।
आकर डाल दी दिल मे नींव गहरी
पूरे चित छा गई हैं तुम्हारी परछाई ।
अब जीना मुश्किल हैं स्मृति के सहारे
खेर रहे कैसे घटा विरह की घहराई ।।
वेदना का जाल जीवन वेदना का जाल
चेतना वर हार जीवन चेतना वर हार ।
खेलता छल खेल जीवन खेलता छल खेल
झेलता विरह रार जीवन झेलता विरह रार।।
डौलता हर धाम जीवन डौलता हर धाम
खोलता दुख गांठ जीवन खोलता दुख गांठ।
बोलता पीर बोल जीवन बोलता पीर बोल
बोहता टीस ठूंठ जीवन बोहता टीस ठूंठ।।
ढल गई रे सांझ जीवन ढल गई रे सांझ
काली कलूटी रात हे जीवन काली कलूटी रात।
नीर आँख अंधी रे जीवन नीर आँख अँधी
सांवरियां पग हैं गात जीवन सांवरिया पग हैं गात ।।
घड़ी अनमोल आई रे जीवन घड़ी अनमोल आई
जाग सके अवसर रे जीवन जाग सके अवसर।
लागणी तन छोड़ रे जीवन लागणी तन छोड़
भवसागर ऊडो रे तार जीवन भवसागर ऊडो रे तार।
मुग्ध मगन हुए राम रस मीठा
मन लगन लगी जग लागे झूठा
माया ठगनी डाले मोहक मूठा
तन मरा माया से हो गया ठूंठा ।