Monday, May 2, 2016

आने दो करीब ।


थोड़ा आने दो करीब
आते ही खो जाती दूरियाँ
हृदय में अनजान उष्मा घनीभूत
बहाव चाहती तुम्हारी ओर निशब्द
नहीं लगता कुछ अच्छा कहा
अनकहा बढने दो
तुम्हारी हर श्वास खबर देती
भीतर की
तुम्हारा अचेतन मौन बन विरल बहता
मेरी ओर
ओर मैं भर उठा हूँ प्रेम की अतुल उफान
पूरा का पूरा
नहीं गुजाईश ओर ज्यादा
होता भी होगा सघन इससे प्रेम दरिया
मत कहो नही काम शब्दों का
बौने हो चुके
खो चुके अपना अर्थ भी आकार भी
निशब्द का यह जादू
पाता हूँ तुम्हारी निकटता वस
दो आत्माओं का महामिलन नहीं चाहता
शब्दों की बैशाखी
केवल अंतरतम की चेतनमय रागिनी
एकलय हुई कह देती वहीं
जो कहना होता जरूरी निशब्द
प्रेम ओर शब्दों का खालीपन
केवल प्रारंभिक कदम निश्छल नेह के ।
छगन लाल गर्ग ।