Sunday, May 22, 2016

हिलता---


विश्वास शब्द अर्थ खो चुका हैं
धन बल सामर्थ्य रूतबा बढ़ा हैं
विद्वान व्यर्थ तर्क जाल हुआ हैं
मानवता चित्कार अनर्थ दबी हैं ।
कोन उबारे किसको चिंता हुई हैं
भूखे नंगे बदन कातर चित खड़े हैं
फौज बड़ी दुर्जन हथकंडे लिए हैं
राग हित सबका कोलाहल रचा हैं ।
परिणाम मत पूछो पता नहीं हैं
इतना कहना शायद जरूरी हैं
विनाश विकास अब कगार हैं
चेतना अब सभी की जरूरी हैं ।
अब कह चुका बहुत पर राग नहीं हैं
थार धरा का उडता काला धुआँ हैं
झिलमिल प्रेम रस वर्षा धार नहीं हैं
सुगंधित पवन पावन स्पर्श नहीं हैं ।
करो करो थोड़ा त्याग स्वार्थ का
भरो भरो रीते हृदय राग प्रेम का
लडो लडो मन हटे राग संग्रह का
डरो बुराई से ध्यान लो ईश्वर का।
चमकती सी हर चीज धुंधली तो होगी
दमकती जिन्दगानी कालिमामय होगी
लरजती थिरकती दुनिया ठहरती होगी
गरजती बरसती घटा कभी मिटती होगी।
कान हैं सच्ची कथनी सुनने के काम लो
हृदय दुखी दशा चित जुड सके ठान लो
सहारा बेसहारों का तन सार्थक जान लो
भाईचारा सबब रहे जीना खुद संवार लो।
दमन हो सके तो दुर्विचारों का हो
मगन हो सको तो परोपकार मा हो
लगन लगी हैं तो अच्छे राह की हो
डगर पावन सर्व हितकारी तेरी हो।
झूठ मूठ के बनने संवरने से क्या पाओगे
लूट पाट के ठाट से भीतर दर्द कैसे बचोगे
कूट मार हडपा धन सिर ऊँचा रख सकोगे
रात दिन मेहनत कमाया संतोष रखे जिओगे।
मत कहना थक गया हूँ
हारा हुआ फिर उठता हूँ
खेल जैसा अब जीता हूँ
कहना मत घमंडी हुआ हूँ ।
जाते जाते फिर ठिठककर देखने लगता हूँ
घर मे पीछे काम की वस्तु तो नहीं भूला हूँ
यंत्रवत जीवन का चलता फिरता नमूना हूँ
घर आँफिस बीच का खरीदा हुआ पुतला हूँ।