Sunday, May 22, 2016

हिलता यथार्थ ।


हिलता यथार्थ ।
हमें कुछ कहने दो
दर्द थोड़ा सहने दो
गम हो तो हमको दो
 विरानी हो तो दो।
माँगना तो अभी सीखा हूँ
जुबान से लडखडाता हूँ
हाथ याचक से बनाता हूँ
स्वर नरमी कोशिश मे हूँ ।
क्या आप रहम सहयोग करेंगे
हिम्मत दम मुझमे थोड़ा भरेंगे
लाचारी का गाना तो ना गायेंगे
मेहरबान दयालु ऐसा नहीं करेंगे ।
बड़ी आशा हैं दिल कहता हैं
काम निश्चित हैं चेहरा बताता हैं ।
अब क्या हो गया हैं आप तो बड़े चुप हैं
देखते मना ना कहे पहली बार घातक हैं ।।
बहुत हूँ भटका आपको तब पाया
कहां मिलते हैं सुनने वाले हमछाया
थोड़ा दर्द भरा अतीत मेरा हूँ लाया
आप सुनेंगे लगेगा मेरा बोझ ढोया।
अब ऐसी जल्दी मत करो
बैठो पास नहीं हूँ चोर कि डरो
नहीं विश्वास खुद पर करो
कष्ट थोड़ा सुनने का भी करो।
तो क्या मैं समझु मुझे सुनोगे
हाल बयान करूंगा नहीं उबोगे
भला हो आपका कृपा करोगे
एहसान से आज आप मुझे तारेंगे।
दुख लगेगा थोड़ा पर मैं तले दबा हूँ
पहचाना आपने अगर तो दुआँ देता हूँ
परायो का क्या अपनों का मारा हूँ
रात दिन नौचा गया ताकत खोया हूँ ।
भाई मेरे कुछ सलाह दो
खाई चौट तुम उबार दो
टीस लगी हैं मरहम दो
अब ना लगे कोई उपाय दो।
खो दिया अब रहा क्या
ममत्व महत्व बचा क्या
कठोर छीना होगा क्या
भूले उपाय दोगे क्या ।
ऊपर ऊपर सांत्वना मत देना
भीतर तक हिले पिघले करना
देखो ठोस नमनीय हो कहना
सुनुंगा मैं कुछ लायक बनाना।
मैं भी कितना पागल हूँ अभी तक अपनी गाता हूँ
शायद बेचैनी ही जीता हूँ माफ करे कहें मैं सुनता हूँ ।
शाम दुख की ढलेगी सुनते हो
विपदा किसे नहीं आती कहो
हर कोई जीता गोदी दुख हो
संभालो खुद को पीर घनी हो।
बीच मे बोलता हूँ पर माफ करना
क्या रटा रटाया कहा सुनते रहना
क्या यही शब्द रह गये उम्र सुनना
अंत करोगे ऐसे शब्दों का।बताना।
जीवन अब वेसा कहां पहले जो था
सब बदल चुका जो पुराना मेरा था
नये विचार मूल्य धोते अतीत गाथा
मित्र मैं नया शब्द अर्थ चाहता था ।
लगता हैं मेरी परंपरा से जीते हो
नयापन अभी कपडों तक लाये हो
अब प्रचलित शब्द से काम कैसे हो
किस उद्देश्य फिर नये बने रहते हो।
जैसे भी हो आदमी तुम सहृदय हो
अपनत्व भूले जग मे केवल बिरले हो
दंश विष पाया नहीं भाग्यवान हो
अब लो दुआँ मेरी खुश हाल बने रहो।
बहुत ज्यादा हो जायेगा सबकुछ बिखर जायेगा
घेरा कमजोर कैसे टिकेगा भंवर मायावी फसा रहेगा ।
कोई उपाय जानता हैं बंधन तौडना आता हैं
तौडने का क्या जोर हैं जोडने मे जोर आता है।
क्या अब रिश्ते अपनापन देते हैं
ओर प्रश्न नये आयाम ढूँढ लेते हैं
मूर्ख हम सभ्य समाज से आते हैं
परंपरा संस्कृति महत्व रखते हैं ।
महत्व किसका कितना आप क्या जानते हैं
कौन प्यारा घृणित हैं भेद भीतर समझते हैं
रात दिन हमें किसकी क्यों याद सताती हैं
मूल विश्लेषण मस्तिष्क रात दिन करता हैं ।
एक महिन किन्तु अशोभनीय तत्व भीतर अडिग हैं
मलिनता अति घनी उसकी सुंदर कवच से ढकी हैं
कवच की मोटी चमडी भीतर की मलिनता ढके हैं
हृदय बेबस टूटा बिखरा दर्द से धीमी कराह लेता हैं ।
कौन ऐसा जो सुन सके कराह हृदय की
कोमल दर्द दे रहा दारूण स्वर की
कलुषित मन ठहाके भरता हंसी की
हमे भौतिक तृष्णा भा रही जगत की ।
अब क्या कहूँ भीतर खाली खाली हैं
लगता खालीपन ही रक्त मिल गया हैं
प्रवाह रक्त वेग घटता बढता रहता हैं
रस रक्त मे संक्रमण से खतरा बढा हैं ।
खतरे एक दो संख्या के हो तो गिनाऊँ
कहां कब कैसे कौन सा खतरा बताऊँ
क्षण हैं हम हैं कल की बात कैसे बताऊँ
आश्वासन आधार कब था जो मैं बताऊँ।
फिर भी आशा का दायरा बढता रहा हैं
आज की परवाह किसे कल को जीना हैं
रहेंगे सदियों राशिफल रोजाना देखा हैं
हडपते लुटते कला से जीवन बिताना हैं ।
द्वीप सागर के मध्य स्थित खड़े हुए हैं
विकराल लहरों का दंश झेल दृढ़ बने हैं
ढेरों चक्रवात झंकझोरते मिटाने तुले हैं
दृढ़ता बीच कहीं करूण पुकार सुनी हैं ।
क्या पुकार ध्वनि प्रहार लहरों के दबी हैं
तरल दृष्टि हमारी उन तक कभी पहुँची हैं
खुदगर्जी मे जीते रहे मानव फिर भी तो हैं
दानव मानव भेद कैसा भाईचारा अमिट हैं ।
आज भी द्वीप बना हुआ अपने दम से हैं
आप सौचे तो कितने खुद के बल बढे हैं
लायकियत खूब बखानी हम करते रहे हैं
जरा नियत टटोले उसमें कीडे अदद पडे हैं ।
आप हमसे नही कहें सब से कहें
सार जग समझे फिर कुछ कहें
बोझ दकियानुसी लिए आप बहे
हम सभ्य हैं असभ्यता क्यों सहे।
पुरानपंथी बना कर सत्यानाश करोगे
शास्त्र ज्ञान देकर भविष्य बर्बाद करोगे
तिकडम का जमाना हमें बुद्धू ही रखोगे
बातें तुम्हारी नीरे मूर्ख होंगे वहीं सुनेगे ।
यहां जितना चालबाज उतना ही विकसित
दगाबाज मर्मज्ञ घना समृद्ध होकर प्रकाशित
सभ्य चोर लुटेरे वहीं तो कुशलता के सृजित
संस्कृति  कुचले वो दुनिया करे परिवर्तित।
ऐ मेरे प्यारे चमन छलक उमडा बांध स्नेह का
विविधता की बाढ संजोये गीत गाता एकता का
बीच इतनी तनातनी भी भर देती अंबार स्नेह का
अच्छे बुरे  भेद नहीं बुनता सपना विकास का