संध्या शनै शनै देने लगती
अपनी संचित कालिस
छाने लगा अब धुंधलापन
शक्लें अब होने लगी धूमिल
हर दृश्य खोता जा रहा अपनी प्रभा
तेजस्विता मात्र आभासित
पूर्व अतीत की तरह
बिल्कुल सामने
क्रिकेट खेलते बच्चे लगते आकृति मात्र
इन्सान की
नही नजर आते चेहरे
केवल चमक देती सफेद बनियान
मानो दौडती जाती मानव आकार पाकर
घरों के दुधिया बिजली बल्ब
शोभित होते सफेद लीली के फूल से
ओर अंधेरे की काली चादर
ढकती जाती रोशनी का हर कतरा
पर्वतीय सडक डूब चुकी घने अंधकार
हुआ एकाकार
खाई ओर सडक का अंतर
कभी कभी बहुत ऊंची टिमटिमाती रोशनी
देने लगती संकेत
मंदिर के पुजारी सहित भक्त जनो का
आराधना के जलते दीपक
भीतरी के तम निमित्त
देते रहते रश्मि प्रभु के सृजन सृष्टि की
घने अंधेरे घीरा खोजता आसपास
कोई रोशन नजारा
नही पाता अचकचा कर समाता हूँ
अंधेरे संग
समय के पंख खोया प्रकाश पुंज
प्रतिक्षा की कीमत पर उपलब्ध
धैर्यपूर्ण समय संग खोता विलय
कर देता अस्तित्व अपना
प्रभा की आशा में यह जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।
अपनी संचित कालिस
छाने लगा अब धुंधलापन
शक्लें अब होने लगी धूमिल
हर दृश्य खोता जा रहा अपनी प्रभा
तेजस्विता मात्र आभासित
पूर्व अतीत की तरह
बिल्कुल सामने
क्रिकेट खेलते बच्चे लगते आकृति मात्र
इन्सान की
नही नजर आते चेहरे
केवल चमक देती सफेद बनियान
मानो दौडती जाती मानव आकार पाकर
घरों के दुधिया बिजली बल्ब
शोभित होते सफेद लीली के फूल से
ओर अंधेरे की काली चादर
ढकती जाती रोशनी का हर कतरा
पर्वतीय सडक डूब चुकी घने अंधकार
हुआ एकाकार
खाई ओर सडक का अंतर
कभी कभी बहुत ऊंची टिमटिमाती रोशनी
देने लगती संकेत
मंदिर के पुजारी सहित भक्त जनो का
आराधना के जलते दीपक
भीतरी के तम निमित्त
देते रहते रश्मि प्रभु के सृजन सृष्टि की
घने अंधेरे घीरा खोजता आसपास
कोई रोशन नजारा
नही पाता अचकचा कर समाता हूँ
अंधेरे संग
समय के पंख खोया प्रकाश पुंज
प्रतिक्षा की कीमत पर उपलब्ध
धैर्यपूर्ण समय संग खोता विलय
कर देता अस्तित्व अपना
प्रभा की आशा में यह जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।