उन्नत शिखर हो उठते नुकीले
जब छूना चाहते आसमान
अपनी विशालता की नहीं करते परवाह
कि रखे इकजाई अपने साथ
घना स्थूल छूटता जाता अपनी प्रवृत्ति पाकर
सूक्ष्म बन जाता निरापद
बेखौफ समर्पण निमित्त ऊँचाईयों संग
नुकिलापन छोटेपन का स्वरूप
बडप्पन कर देते विसर्जित
नीचे धरातलीय स्वरूप बन जाये पुख्ता
ओर सूक्ष्म स्वरूप बढ़ सके शिखर
ओर पा सके अनंत
बहुत कुछ सार उकेरती यह ऊँचाई
ओर यात्रा अनंत
बडप्पन की विशालता ऊँचाई नहीं
धरातलीय पुख्तापन देती
जिससे सूक्ष्म अनंत छूना हो सके।
छगन लाल गर्ग ।