Thursday, March 31, 2016

स्फूर्ति ।


गजब स्फूर्ति
पाता शिथिल तन
सुनता नवल कुसुम खिला
उजडे गुलशन
हवाओं का चक्रवात
आने लगा समझ
घेराव डालती नाचती पवन
मिट्टी संग
ठीक मेरी तरह
प्राण राग उकेरता
तन मिट्टी बना
घुला मिला अस्तित्व एकराग
नहीं रही भिन्नता
भीतर बाहर पहुँच हुई
पहली बार आनंद द्वार
आमंत्रित हूँ खुले दरवाजे
अनंत यात्रा निमित्त
नहीं अंत कभी
हर बार नव आकार लिए
कभी चक्रवात तो
कभी ऑधी
कभी शीतल मंद बयार
हिडोलित करती जाती
आत्ममय आकार प्राकृत
यह आभास का छाया
बनने लगा हकीकत
इसी जीवन कर्म बंधन
देते जाते परिणाम
आस्था जुड़े प्रश्न स्वयं
बनने लगे जवाब
हिसाब संतुलन बराबर
स्वयं कर्ता करता ।
छगन लाल गर्ग ।


मेरा नाता ।


शिक्षक मित्र की
सेवा निवृत्ति का दृश्य
बाजे गाजे के साथ
देखता हूँ आते
सड़क सड़क
मेरे घर की तरफ
पक्की सड़क छोडनी पडती
जब आना होता मेरी गली
व्यवस्थित परन्तु
पसरी  हैं  कच्ची सड़क
मेरी घर की तरफ
शिक्षक मित्र
अच्छे घर के वैभवशाली
बड़े सुंदर बंगले के स्वामी
बड़ी चौड़ी पक्की सडक जाती
उनके घर से सटी सड़क
पता नहीं क्यों निकलता
बरघोडा पक्की छोड़ कच्ची सड़क
घुडसवारी किये शिक्षक मित्र
आते दिखते धीरे धीरे
अपार भीड़ के साथ इस तरफ
विशाल टेन्ट सजाया संवारा
रिटायरमेंट पार्टी निमित्त
बढ़ता घोड़ा नाच करता आता
मित्र को लिए मेरी तरफ
उठता हूँ लिफाफे मे पहले से ही तैयार
आभार रकम देता विनीत होता
मुस्कराता देने लगता हूँ बधाई
पर भीड़ के शौर मे
नहीं सुन पाते मित्र
ओर न मैं स्वयं
लिफाफे पर उनकी दृष्टि भी नहीं
केवल नाचगाने के साथ
चलता जाता कारवाँ
उनकी प्रतिक्रिया वंचित हुआ मैं
स्थित प्रज्ञ सा देखता
सुरक्षित स्थान पर खड़ा
ओर आवाजें होती जाती दूर
चारों तरफ मुझे घेरे
देखता हूँ धूल भरा गुलाल
सेवा निवृत्ति का
बडा नाता करता हूँ महसूस
अपना भी
उडती धूल से बने गुलाल से ।
छगन लाल गर्ग ।

उलझे रास्ते ।


उलझ गये रास्ते
एक दूसरे से
व्यक्तिगति रोकने नहीं
अपनी सार्थकता सिद्धि हेतु
ओर घने दावों का सच
नहीं आता समझ
अंधेरा घीरा माहोल
प्रकाश बिना
चमकीला उजाला सत्य का नहीं
चकाचौंध भरा
केवल अस्मिता निमित्त पाखंड
मायामय भ्रामक भूल भूलैया का पुञ्ज
ओर यही कारण
असलियत का प्रकाश नहीं देता रोशनी
जीवन की राहों को
बिना रोशनी की राहें
पाखंड प्रकाश से आलोकित करती
दिशा हीन मार्गदर्शन
ओर राहें नहीं देती मंजिल
असमर्थ बना राही भ्रमित राहों
चलने बाध्य
असलियत तलाश अन्वेषण राहें
स्व रोशन मर्मज्ञ व्यक्ति का स्वप्न
होने दो पूरा
चकाचौंध के पाखंड को त्यागना
हमारी जिम्मेदारी ।
छगन लाल गर्ग ।

Wednesday, March 30, 2016

परीक्षा ।


नहीं रखती महत्व
परीक्षा चौटिल व्यक्तित्व
दौडती धारा में प्रवाहित
उसका तैराकी का
अनुभव दे जाता काम
कठोरतम जड जीता
संवेदना हीन जीवन
हर परीक्षा उसकी होती पक्षकार
वह स्वयं बनता सूत्रधार
आस्थामय व्यक्ति जीवन
परीक्षा का असली संभागी
शायद वहीं बेठता अदृश्य
की परीक्षा में
होती हैं परीक्षाऐं पर
पात्र वहीं व्यक्ति
पहले होना होता काबिल
हर एक की नहीं परीक्षा
पर जटिलतम जीवन का
अंश होती परीक्षाऐं
मूल्यांकित होता अस्तित्व
ज्ञान ओर चेतना का
तर्क ओर क्षमता का
रूपक बनता सत्य का
केवल निष्पक्षता
धारण कर लेती मौन
ओर झकडता जाता
चेतन व्यापक
क्षुब्धता घेरती व्यक्तित्व
असलीपन की पहचान पाता
व्यक्तित्व
अन्तोत्वगत्वा परीक्षाऐं ईश्वरीय
आकलन कृपा का
पहचान पाना सत्य ही
सच्ची सफलता हैं जीवात्मा की
बिना शिकायत ।
छगन लाल गर्ग ।

व्यथित जीवन ।


विकल व्यथित जीवन
आज हर मनुष्य
वासना जीता
ओर वासना मांगती
निरंतर वैभव पल
अज्ञात आकांक्षा सुख बीच
भयभीत करती
विडंबना भरे अंधकार मय दुख की
नहीं भरोसा स्व पर
दुर्बलताओं मे कैसे करू
अच्छे क्षणो की कामना
आशामयी आस्था
मिट जाती जिन्दगी से
हर पल होता
कातर अशांत अस्थिर
वर्तमान का शुष्क कंठ
भोगता हूँ अतृप्त सा
हर क्षण
ओर अहसासहीन
जीने लगा बेहोश जिन्दगी
स्वप्नवत घीरी
हर ख्वाहिश
रहती अधूरी
नहीं होती कहीं
आकांक्षा पूर्ण
ओर अति
 व्याकुल दशा माँगती
हिसाब सुखो का
अपने हिस्से तमाम संघर्ष
सहने के बाद
अभी नहीं मिला न्याय
ओरो की तरह
कारगुजारी भुगती
सुख निमित्त
स्वप्नवत नहीं टूटती बेहोशी
अंतराल घना बढता जाता
सत्य ओर छलावे बीच
ओर घीरती वासना
निरंतर अब देती चुनौती
समर्पित जीवन की
शायद जीवन अंत दे सके
वासनाओं को विराम
अब निरूद्धेश्य
जीने का मकसद नहीं रहा।
छगन लाल गर्ग ।


रूदन।


रूदन मत रोको
बहने दो
अविरल अतिशय वेग
आँसुओं का
विवेक ओर रूदन
विपरीत दशा भावों की
नहीं देता काम
अतिशय आवेग दुख प्रवाह
मत कहो मूढता यह
बहने दो आँसू
भीतर हृदय जमा कालापन
कूडा दुर्विचारो का
बहने दो आँसू बनकर
नव बोध होने दो
ताजेपन का
शुद्धता का अहसास स्नान सा
निर्मल चित हो जाने दो
ऑसू मेरे
बहने से रीतता सूना हृदय
प्रस्फूटित करना चाहता
नव ऊर्जा लिए
जीवन संजीवनी नव रस धार
रूदन की बेला
नव सुख प्रस्फूटन की सूचना
भावी संकेत सुख मात्र ।
छगन लाल गर्ग ।


आनंद ।


आनंद आना चाहता
तब जब विसर्जन करते
अहंकार अपना
जब तक अहं का घेरा
चारों ओर
नहीं आ सकता रस
जीवन के सूनेपन मे
ओर यह अहंकार
नहीं जाता
अनेकानेक प्रयास बाद भी
अपंग महसूस करता
स्वयं अपनापन नहीं पाता
शिवाय इसके
बडा गहन अनुभव इसका
गहन दुख पल
करता हूँ महसूस सघनता
तब लगता
दुनिया का अहं अहंकार जीता
संपूर्ण सार समाया मुझमें
ओर विषम गहन बनी पीडा
आकर घर कर जाती
पीडा आगार बन जाता मैं
परिपूर्ण परिपक्व
रोकता हूँ स्वयं मैं
जीवन रस के सारे स्त्रोत
घनीभूत पीडा सम्राट बनकर ।
छगन लाल गर्ग ।

Tuesday, March 29, 2016

अवगुण ।


नहीं इतराता
अवगुण बहुतेरे संचित
चल रहा जीवन
कला समझ गया
श्वास लेने की
नहीं ऐतराज मेरा
किसी को
कि क्यों जिंदा मैं
झुकता हूँ हर जगह
नहीं करता कभी ऐंचातानी
नही बांध पाया कोई
मुझे
स्वच्छन्द रहा जीवन
केवल मात्र
नहीं अवगुण
कोई एक
अनेको रखता अवगुण
जीवित रहने निमित्त
हो जाता हूँ
हर जगह समर्पित
नहीं रखता दुराव अपनों
ओर परायों बीच
चला जाता हूँ
वहां भी ऐसे स्थलों में भी
जहां समझा जाता
समर्पण को गलत
आदमियत की
अंतिम गिरावट दशा
मानते करते विरोध
जाता हूँ वहां भी
सुनता हूँ हृदय से
इस कारण कि कितना सत्य
उनकी बातों की सत्यता में
विश्लेषण बोध की काबलियत
करता हूँ पैदा अपने में
बौद्धिक कसरत की क्षमता
शायद आ सके
करता कोशिश संभव लगता
आंशिक समझ से पा सकूँ
कुछ सत्य
कोन जाने मैंरा समर्पित जीवन
सत्य समर्पण का मार्ग
बन सके मोक्ष मार्ग ।
छगन लाल गर्ग ।

आत्मानंद ।


मिजाज बदल चुका
मौसम
बाहर कटे
वृक्षों की डालियां
अभी नहीं घीरी
पत्तों से
हर बार की तरह
छाया छितरया सा
नहीं दे पाता
घनी छांव
ओर मैं
पहेलु बदलता छाया साथ
खुद भी हो जाता
बदलते छाये के साथ
अपनी जगह बैठा
वृक्ष की छाया
घनी हो उठी यह धूप
ताप का तीक्ष्ण आभास देती
छाया नकारती धूप
ओर मैं नितांत अकेला
उठती नजर देखता
ऊँचे आसमान की ओर
असामयिक बादल
उडते जाते बहुत ऊँचाई पर
देखता हूँ ढकते सूर्य को
ठीक यही दशा
हृदय गगन मे उठते बेजोड़
विचार रूपी बादल
परत दर परत
ढकते जाते आत्मा का शात्विक तेज
नहीं हो सकता पावन
विचारों के रहते
बादलों की तरह अंधकार घेरते
पर यह भी सत्य
हटना होगा इन्हें
ओर हटते ही निखरता सूर्य का उजास
शायद जान सकूँ
विचार शून्यता उपरांत
स्वयं के होने का आनंद ।
छगन लाल गर्ग ।

प्रभु मेरे ।


प्रभु मेरे
मत पहुँचा देना
उस धरातल के कीचड़ मे
जहां दुर्गंध भरी हो पवन
ओर श्वास लेते
भा जाये गंध
यही से होगा मेरा अंत
आरंभ पतन की खाई
गिरते हुए देगी ग्लानी
कसक भरी दारूण यंत्रणा
सहूँगा कैसे
ओर इस संसार में
सबसे बुरा भाव आत्म चेतन मे
स्वयं के प्रति निंदा
आत्म निन्दा
फिर कैसे पहचान पाऊँगा
मेरे प्रभु तुम्हें
मेरे भीतर तुम रहते भी हो
करूँगा कैसे
विश्वास आत्मा परमात्मा की अद्वेतता का ।
छगन लाल गर्ग ।

अस्तित्व ।


अस्तित्व मेरे
ना तुम बहुत ऊँचे
सर्वोच्च
कि गहन अहंकार से भरा
समझ लूँ स्वयं
दिव्य अलौकिक प्रभुत्व स्वामी
ना तुम इतना निम्न
इतना लघु कि न दिखूँ
खुली आँखों से भी
बदतर हो जाऊं
मानवता की तल से बहुत नीचा
ना गलतफहमी भर लेना
तुलनात्मक जीवन जीने की
ना निन्दा का भाव
ना ही स्वयं के यश गुणगान
आकांक्षा से भरना मुझे
मेरे अस्तित्व
चाहता मैं असलियत भरा
सहज सीधा जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।

Monday, March 28, 2016

नमित हूँ कवि जी।


सहारा हैं कविता
कुछ अनगढ कवियों का
आत्मा को नहीं होती
सहारे की आवश्यकता
मन बेसहारा
वह ढूँढता रहता सहारा
अपनी जरूरत
जिसमे मात्र छीपा गहरे तल
अहंकार का घाव
वहीं रीसता जाता शब्द बनकर
पर यह नहीं जरूरी
कि हर व्यक्ति हो कवि
ओर हर व्यक्ति पा जाये
आत्मियता
यह सर्वथा अलग सत्य
आजकल किताबी शिक्षा
बन गयी मापदंड दम खम
कवि का
अंकन का सरल आधार
ओर पाठक होते रहते
निराश
बिना आत्मीयता की रचना
मन की जन्मी
चाहती बैशाखियां
अब नहीं जरूरी यह
कि बैशाखी काली या सफेद
डिग्री पढी या स्कूल
नहीं इसका मतलब
लंगडे मन को चाहिए
मात्र सहमति
सहारे की आवश्यकता
ओर इसी कारण
शुष्क जीवन कर जाती
कविता
अपने से लडती
उलझी झगडती कविताएँ
कहां पायें आत्मरस
ओर हम
कह पाये उसे काव्य
घना बीहड जीवन
जहाँ कवि हृदयों को
झूझना होता बेअर्थ प्रलाप से
ओर चेतन को
मिलती रहती
चुनौती स्वमूल्यांकन की
नहीं हो पाता सोचा
कि मिले कही जीवन रस
काम योग्य
कवि का
लंगडा मन कुछ कृत्य चाहता
ओर इसी कृत्य का परिणाम
आज के नव कवियों की कविता ।
छगन लाल गर्ग ।




अकारण जल्दी ।


अकारण मत करना
जल्दी
हमारी तरह
तुम भी
जीवन से सबकुछ
पा लेने की आशा
मानव रहते अति मुश्किल
अतिक्रमण हो
मनुष्यता का तभी संभव
यह ज्यादती होगी शायद
अगर हमसे हो सामान्य
न हो तुम हमारी तरह
आदमी
स्वाभिमान सत्य सदाचार
अंगीकृत हुए
तब हम हो जाते झूठे साबित
बहुत शीघ्र
ऊँचाई उठने की काबलियत
तुम्हारी
प्रसिद्धि डंका बजना ही चाहता
तुम्हारे सिर
कारण हैं तुम्हारे पास
आत्मीयता की जगह
चालाकी फरेब हथियारों से
सांसारिक संघर्ष जीतकर
निश्चित ही
सच्चाई भरी आदमियों की दुनिया
पार करके तुम
पहुँच चुके पशुओं के जंगल
ओर यहाँ
कोई ओर ताकतवर बन कर
मिटाये हस्ती
करनी होती है अतिसार की
जल्दी ।
छगन लाल गर्ग ।





मूढताऐं मेरी।


कैसे हो सके
मेरी मूढताओं का विश्लेषण
सत्य की आँच बिना
परम सत्ता पहचान बिना
बहुत हूँ खाली खाली
खूब पढ़ा पर
पंडित न हुआ
भ्रम सागर डूबता रहा
कहां छिपा सत्य
हर पुस्तक टटोलता रहा
ओर सत्य
हर पृष्ठ से सरकता
खो जाता शून्य में
होता होगा
सत्य अनुभूति तल
नहीं उतार पाये मूल
पुस्तक मे
केवल छाया बन हुआ
प्रतिबिम्बित
किताबों में महात्माओं की
कभी आधा कभी अधूरा
नहीं पकड़ पाई चेतना
अब तक
कुछ पाया भी
रहा अनपाया ही
लगता जाता
किताबी सत्य कहता
कि सुनो
परमात्मा मांगता
निरंतर बलिदान
कभी राष्ट्र के नाम
कभी धर्म के नाम
कभी जाति की समृद्धि के नाम
बड़ा किमती बौध पाता
आज प्रबुद्ध नीतिज्ञों से
बड़ा अजीब मानव
बन गया हूँ आज मैं
असलियत में जिन्दगी मेरी
नहीं लगता कोई हक हो मेरा
बिल्कुल खालीपन जीना मेरा
तुम चाहो जहां
तैयार हूँ मैं
अपनी देने कुर्बानी
कहीं भी जैसी हो
नीतिज्ञों की इच्छा ।
छगन लाल गर्ग ।

Sunday, March 27, 2016

कवि कर्म।


आजकल प्रसिद्ध सृजक
हवाला देते पहले
उपार्जित ऊँची डिग्री का
अन्वेषण विषय मय शीर्षक
कविता सृजन पूर्व
परिचय में
कविता प्रभावित करे नहीं जरूरी
परिचय मे शब्दों की
जटिल श्रृंखला जरूरी
ओर अभिव्यक्ति के नाम
बेअर्थ प्रलाप घीसा पीटा
ताज्जुब का दरिया तब उछलता
जब पढते चेतावनी
समझने लायक
अपनी कविता की मौलिकता
दावा ओर अवैध प्रयोग पर
कानूनी धौस
अब भाई बड़ी मुश्किल से
ऊँचे परिचय कारण
पढ लिया
काठ की हांडी से भूख
कैसे मिटेगी ।
छगन लाल गर्ग ।

भाषा ।


कहना हर किसी को
अंग्रेजी बोलता
हमारा बच्चा फरार्टे से
फूल जाता मेरा सीना
हो जाता छप्पन इंन्ची
चलो हम नही पढ़े तो क्या
उतरावस्था मे पाई हमने
जीवन की पूर्णता
मशीनरी स्कूल पढ़ता
उसे देखते बोलते इठलाता हूँ मैं
अरे भाई
लंबी चोडी पढाई के बाद भी
हम नहीं सीख पाये
धारावाहिक बोलना हिंदी मे
सुनते हो बच्चा बोलता
धारावाहिक अंग्रेजी
अच्छा हुआ नहीं रहे सरकारी
स्कूल भरोसे
पेसा लगा सही रास्ते
पर दर्द उभरता उस समय
जब हिंदी  शब्दों के
पूछता अर्थ अंग्रेजी मे
गड़बडा जाता मैं
क्या बताऊँ
हिंदी वर्णाक्षर शब्द नहीं जानता
उच्चारण नहीं कर पाता
हिंदी शब्दों का
धंस जाती सारी हैकडी मेरी
जिसे अपनी माँ की पहचान नहीं
वह क्या कर सकेगा
मानवता की कद्र
संघर्ष प्रतियोगिता वस
ओर पद प्राप्ति से ज्यादा जरूरी
मातृभाषा व माँ की पहचान
उसका ममत्व पाये बिना
जीवन निस्सार ।
छगन लाल गर्ग।

मेरा भय मेरा साथी ।


जानता हूँ कि
मैं हूँ
केवल इसी कारण
जीवित कि
रहता हूँ भयभीत
घर मे पत्नी व बच्चों से
गली के दादा से
गाँव मे पंच सरपंच से
पटवारी ओर पुलिस थाने से
सुबह से शाम
जहाँ कहीं भी जाता मजूरी
इनके कृपा से पाता हूँ काम
सारी उम्र कट गयी
इनकी बेमोल सेवा मे
अच्छा हैं
तीज त्यौहार पर बुलाते काम लिए
देते फटे पुराने कपड़े
निकल जाते बारह महिने
पर दशहत हर पल रहती
कब किस भूल पर
हो जाये नाराज
फिर अंजाम अकल्पनीय रोगटें करता
घर वाले तब तक मेरे
जब तक बाहर से रहता भयभीत
वैसे कहते
खूब करते मुझसे प्रेम
अब नहीं समझ पाता
भय ओर प्रेम का अजूबा
एक साथ
मेरे जीवन मे रहा कैसे
भयभीत जीवन मे कहां प्रेम
कब मिटेगा
सामान्य जन का भय
ओर समझ आयेगा
आजाद भारत का प्रजातंत्र ।
छगन लाल गर्ग।



Saturday, March 26, 2016

अंतर ।


नहीं दिखता अंतर
गिर जाता देहिक भेद
साक्षात प्रकट भी
देखती आँखें जब भीतर की
नहीं दिखता अंतर
तुम्हारे मेरे बीच
कि मैं पुरुष तुम नारी
नहीं हृदय धरातल पर
कोई फर्क
या कि विचार सोच
मनन स्तर पर
तुम्हारा मेरा अलग होना
होता हो साबित
भावनाओं की तरंगों बीच
गुम जाते हम
नहीं रहते स्त्री पुरुष
एकरसता मे विलय हो जाते
सारे भेद
पर जब घेरती वासना
तुम्हें या कि मुझे
वेगमय तरंगे लेती जन्म
काम वासना की
तुम बन जाती प्रथक
मैं बन जाता प्रथक
हम बन जाते शरीर
अलग अलग ध्रुव लिए
ओर काम का ज्वार
आँधी बन उजाडता
विचारों का गुम्फन
नहीं तब हम
हो जाते शरीर केवल
तृष्णा का धुआँ
उठता जाता
ओर ध्वंस होती जाती
सीमाएँ
नैतिकता की
रह जाते वासना के पुतले
इस क्षणिक सत्य
संतुलन पर आश्रित हैं मानवता।
छगन लाल गर्ग।

साबित सत्य ।


सत्य साबित नहीं
संचय हर क्षण
नहीं मुक्ति
बिना संचय के
नहीं रह सकता
संसार
आबाद हैं हम केवल
संचय बदौलत
ऊहापोह भरे हर क्षण
हम स्वयं रचते
अपने स्पंदन निमित्त
ओर देते जाते
पुष्टि अपने गढे को
हाँ सत्य वहीं
जो रचा हमने
हमारी उपलब्धियों का
हर संग्रहण
हमारी रचना
वहीं संसार हमारा
ओर हम निरंतर
बेहोश हुए
संग्रहित करते जाते
भौतिक सुविधा
पद की गरिमा
नहीं हो पाते निवृत्त अंत तक
संग्रह की भूख से
ओर फिर
क्षमताओं की
थकान से शिथिल
पाना चाहते मुक्ति
माया से संसार से
क्या यह होगा
यह प्रश्न मेरा नहीं
हर संसारी का
अंतिम
भाग दौड की संध्या पर
बलात सबल होता
ओर तब बार बार
पश्चाताप होता
कास सृजन कर्ता नहीं होता मैं
रहता सरल मानव स्वभाव में।
छगन लाल गर्ग।

अदृश्य सृजन ।


अंत मत कहो
नहीं रूकता सृजन
अदृश्य
गूँथता जाता चेतन
साकार दृश्य संभावित
संसार की यही प्रवृत्ति
असंभव देखा सुना
संभव होते
ओर महसूस हुआ जड
फिर श्वास लेते
होते हैं करिश्में
आधारित हर क्रिया कर्ता के
ओर वह
कोई ओर नहीं फक्त मानव
जो दंभ भरता
अपनी प्रगति पराकाष्ठा
अब हर क्षेत्र
करता जाता हस्तक्षेप
शायद बनना चाहता निर्माता
खुद अपना
नहीं जानता जब कदम
लेंगे रफ्तार
अस्मिता अपनी ढूँढते
नहीं पा सकेगा
अस्तित्व की चेतन दशा
शायद विकृत मानसिकता का
विशिप्त किनारा आ चुका
संभलने का उपाय
विवेक नही ज्ञान नहीं
अबोध दशा ही
आखिर उपाय मानवता का।
छगन लाल गर्ग।


नैतिक जीवन ।


कोसता हूँ मैं
कभी कभी नहीं
हमेशा अपने आपको
यह नही हुआ अभी
हो जाना चाहिए था
आत्म निन्दा का भाव
नहीं हो सकता मुझे
बहुत नैतिक जीवन मेरा
घने गहरे बसी हुई
संस्कृति की जडे
हर क्रिया शुद्धता लिए
पावनता का प्रदर्शन
तन व्यवहार मे भासीत
वर्ण व्यवस्था की पावनता
हमारे से बनी
अशुद्ध लोगों से रखता हूँ दूरी
निन्दा पात्र हैं वे
जो नहीं जीते अपने वर्ण
व्यवस्था के शत्रु भी
नैतिक जीवन के शत्रु भी
हमें कहते जाते पाखण्डी
पर जब कभी लौटता
अपनी आत्मा के उजाले
करता हूँ महसूस
कि नैतिकता से जुड गया
सत्य मे पाखण्ड
यथार्थ मे
नहीं हूँ मैं परमेश्वर का आशक्त
केवल दिखावटी आदर्श का बना
पाखण्डी पुतला
ओर होता जाता साबित मुझसे
निन्दा करता जाता मैं
सबसे अधिक पाखण्ड की
समझते अपने को
नैतिकतावादी
 संचय निरंतर अब बढता जाता
खुद अपने पर
ओर कोसता रहता स्वयं को।
छगन लाल गर्ग।

Friday, March 25, 2016

संवेदना ।


संवेदनाओं से होता
भीतर का स्पंदन
अति वेग लिए
तंरग उठती गिरती
संचलन होता सक्रिय
देह का
अन्यथा नहीं रहता मैं
आकार पाता हूँ चेतन
देह नहीं स्थिर रहती फिर
अस्तित्व पाने लगता
अपना मौलिक वर्चस्व
चेतना के दीये देते जाते
सामर्थ्य का उजाला
ओर मन की वीणा
लेने लगती संगीत रस
अनजान स्मृति भरा
शायद बहुत फासलों मे
जाना पहचाना
ओर अपना भी
छूटा भूला सा
आह कितने मोहक अंदाज
अस्तित्व लिए सुशोभित
आँखों का यह तृप्ति दीदार
सौभाग्य का वरदान
अलौकिक का
जो बरसता जाता
लौकिक हित
ओर तभी
यह देह पाती आकार
मंदिर का
ओर तभी जल पाते चेतन दीये
अदृश्य परमात्मा के ।
छगन लाल गर्ग।

प्रबुद्धता।


मेरे प्रबुद्ध चित
असीम ज्ञान ग्रंथों के धनी
पूर्ण भराव से तने व्यक्तित्व
पात्रता की पैनी धार पर आसीन
अति सामर्थ्यवान प्रभुत्वधारी
धरातल के गणितज्ञ
अपनी हर श्वास की कीमत वसूलते
अतुलनीय निःसंदेह हो तुम
ओर ऐसे मे ऊँची स्वर्ण जात
हर तरफ की ऊँचाई
केवल तुम्हारे लिए
युग का संचालन तुम्हारी मर्जी पर
केवल इतना सा निवेदन
धरातल की यथार्थ चेतना में
पनपते सरल शात्विक जीवन में
प्रबुद्धता भरा तुम्हारी श्रेष्ठता का बीज
मत डालो
जटिल तुम बनते रहो
सरल निखिल जग मे उच्चता का
विष मत घोलो
प्रदूषित तुम्हारा जीवन रखो हमेशा
धरातल से दूर ।
छगन लाल गर्ग ।

कामना।


हम सब हैं काम
इच्छाओं का विस्तार
यह जगत
सब व्यस्त अपनी गरज
हो सके
कामनाओं की आपूर्ति
रात दिन यही कसक
लगे हैं अपने कारण
कुछ बोध हो
अन्य भी
समझे तोले हमें
ओर हमारे में
कुछ अलग दिखे
प्रभावित करने लायक
वजन पाऊं मैं
मेरा समस्त विस्तार
आये समझ लोगों के
ओर महता का
अंकन हो
नहीं आपत्ति
विनिष्ट होते हो
ओरों के सपने
होने दो
या कि
राहों के काँटे
हो चुभने लायक
जलाना होगा उन्हें
मानवता का नाम देकर
हटे स्वतः अच्छा
केवल अवसर की
चुनौती दो उन्हें
हमे बढना आता
बाहर की ओर
बढता काफिला
अभी सूर्योदय काल
आओ सभी समझदार
प्रगति के पहियों
एक नया संसार बना ले
काम भरा कामना निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।

आत्म सुख।


सुखी हूँ मैं
क्या गलती मेरी
यदि मैं करता हूँ भरोसा
हर इन्सान की नियत पर
बेवजह नहीं पूछता औकात
किसी से
ओर खुद संतोष कर लेता
जो भी मिलता
ना मिले कुछ नहीं होता
असंतोष का अहसास
नहीं उठता नीचे जमें तल से
बेठना उठना नहीं मेरी मर्जी का
वह जाने बिठाये कि उठाये
नहीं ऐतराज मुझे
कोई पहाड़ बने कि नदी
यह उसकी प्रवृत्ति
नहीं करता दमन अपना
रोज रात पहुँच जाता
अचेतन में
जहाँ न शरीर न संसार
छोडा छुटता सा
ओर प्रभात के समय जागता हूँ
सर्वांग चेतना लिए
मिट्टी का तन मिट्टी ही
सत्य
फिर इसके लिए क्यों करूँ गलती
दुखी रहने की
 सुखी रहना स्वभाव हो
हम सभी का ।
छगन लाल गर्ग।

Thursday, March 24, 2016

प्यासा मन।


आह घना प्यासा
संतुष्ट जीवन नहीं तुझसे
हर तृष्णा कहां पाली
कि मनन लाई
आँखों में उभरा बिम्ब
घना सौन्दर्य मय
कमनीय महत्वाकांक्षाओं का
आकर्षक चित भरता
खजाना
आह बहुत सुंदर दिव्य
लुभाते ही होने लगता बेचैन
पाना भरपूर देखना भी
भोगना भी
रूप राशि स्व चेतना से सजल
मन की मुरादों से लबालब
अति गहरे
खूबसूरत भावों से घीरा काम
शायद जरूरत भी
रूप मद गौरव विखण्डित होता
वासना क्षणिक सुख
अहसास पल का
ऊर्जा का रूपांतरण
सिरहनमयी शांत दशा
पर कहां रहा आया रहा
सुख समय
अभी प्यास घनी बढ चुकी
ओध नहीं देता संतुष्टि
यही कारण
जीये जाता हूँ नित्य
लिए सुख महत्वाकांक्षा की गठरी
जीवन घटता जाता
ओर गठरी वासना बढती जाती
समय बढने के साथ
बहुत भारी लगती
चल नहीं पाता इसे उठाये
कांपते हैं पैर
ओर वासना वजन दबाव देता
थका लाचार
ऊपर दृष्टि नहीं पहुँच पाती
अनंत मे रोशनी खोती जाती
किसे सुनाऊँ व्यथा
व्यर्थ रहा जीना मेरा
कसूरवार संपूर्ण मैं क्या
प्रश्न बनाने का नहीं हक मेरा
निश्वास की वायु की आस लिए
जीता जाता हूँ शेष।
छगन लाल गर्ग ।

आँखें ।


आँखें
कब देख सकेंगी
सत्य
वासना रहते
निरंतर भटकाव दृष्टि
सौन्दर्य पर
यहाँ वहाँ केवल नयन सुख
कहां कहां नहीं पहुँचा
दूर ही सही
मिले मदमाते उभार लिए
अनुपम संवरा हुआ
तीर सा चुभता
कसक भरता सौन्दर्य
कि बढ़ती रहे बेचैनी
पा जाऊं परख सुंदरता की
ओर तब
करू चर्चा भीतर बाहर
स्व मय सफल आँखों का
सार्थक होना ओरों को
ओर मैं यूँ ही
अतृप्ति के गहरे अंधेरे कुएँ
गिरता रहूँ निरंतर
लालसा का संबंध
आँखें जोडती भी ओर
बार बार तलाश करती
लावण्य के नये बिम्ब
कि इसी मकसद
सृजन का सुख नकारा कर
गुजरती रहे बेभान जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग।

मेरा प्रेम।


लुभाता घना
प्रेम शब्द
अच्छा लगता ओर अधिक
जब चाहत हमारी
कामयाब होकर
रस घोलती सी कहती
प्रेम का इकरार
ओर तब हम खूब भर जाते
उन्माद की तंरगों मे
वीणा के मधुर संगीत स्वर
रसमयी धार उडेल देते
तन मन
खूब उलझ जाते हम
आ जाते बातों मे फिर
जो भी कहें
शास्त्रीय वचन
अच्छे समर्पित ज्ञानी बन
वहीं करते
जो मृदुल मादक स्वर कहते
क्या कहूँ इसे
क्या शात्विक स्नेह का दरिया कहूँ
या कि वासना की गरज
कहां हैं सत्य
कहां हैं प्रेम
नहीं सत्य यह सब
बड़ी कडवडाहट भरी हैं जिन्दगी
केवल व्यवहारिक बना
हमारा जीवन
शाश्वत प्रेम अब कहां
नहीं करते ऐसा प्रेम हम
खुद अपने आप से भी ।
छगन लाल गर्ग।

Wednesday, March 23, 2016

असत्य हूँ मैं ।

घना जी लेने के बाद
अब कहता
असत्य हूँ मैं
अब यह लगता ऐसा
कि मेरा अपना
बहुत कुछ सब कुछ
केवल झूठ
मेरी भी ओर आपकी
सुनी सुनायी परी कथा
वेदों ओर पुराणों के
अनुभूत सत्य
असमझे रहे नहीं कर पाया
व्याख्या समयानुकूल
शब्द समस्त देते प्रतिक्रिया
युग साक्षेप
ओर जमाने का यथार्थ
देता अनगिनत भावों का गुम्फन
विश्लेषण मे सारे भाव
केवल असत्य ओर भ्रमित
मेरा प्रेम
अतिशय पावन शब्दों से मंजा
स्वार्थ की पृष्ठभूमि पर टीका
आजतक
महसूस करता समय के साथ
चमकीला मुल्लमा उतरा हुआ
नीरस ओर उबाऊ
प्यार मेरा
सचमुच का झूठा निकला
हर ओर से
मेरी मंदिर की प्रार्थना भी
केवल झूठ
तल्लीन श्रृद्धा में डूबते भी
भटक जाता मन
सच्ची प्रार्थना से
हर क्रिया मेरी बन चुकी
दिखावा मात्र
नही जानता सत्य हैं कहां
विभ्रान्ति ही अंत बना
जीवन मेरा ।
छगन लाल गर्ग।

करो कुछ ।


करो ना कुछ
संसार बने हमारा
मत हो जाओ शिथिल
थकना छोड़ो ना
शरीर का काम मत लो
मन से
कि हर बार
विश्रान्ति चाह घेरे तुम्हें
भटकन चलती रहे
निशान कहीं जमेंगे ही
पदचाप अधिक धरातल नहीं
सीमित सूनेपन जमती
तलाश सूनेपन की पर
सक्रियता संसार बने हमारा
यही युग सत्य
फर्क करो ना
भीतर बाहर परिपक्व बनो
यश का दीया
 सीमित से जन्म लेता
फिर घेरता विशाल
कर्ता बनना होगा मन से
तभी समर्थ होंगे
संसार करेगा नमन तभी
कर्ममय प्रण
जीवन नहीं संसार देता
यही शाश्वत सत्य ।
छगन लाल गर्ग ।

मूढता ।


मूढता हुई जाती गहन
घने अंधकार में
बाहरी रोशनी नहीं पहुँच पाती
अधिक भीतर
केवल स्पंदन देती किरण
सुबह की
स्व स्फूरण रह जाता बाकी
भीतरी रश्मि बिना
बाहरी बाहरी टिम टाम देता
प्रतिष्ठा की रौनक
नहीं  सत्य पाई चेतना
यह आवरण बन बेठा
पक्की दीवार सा
तरल चेतना नहीं पाती राह
रोशन हो सके अंतरतम
चिर मोटा अंधकार
तह दर तह जमा
स्थूल देह का सौन्दर्य
वर्ण वर्ग लिंग का वर्गीकरण
अंधविश्वास का सहारा
यही आस्था ओर विश्वास
सत्य के मापदंड
अजीबोगरीब बोध बने
सुविधा का सत्य
ओर भौथरा गया दुनिया से
असलियत भरा बौध
कहां हैं सत्य
चेतना के दीये
बंदिशों में जलते
शुद्ध हवा बिना
दम घौटते बुझने लगे
कोई हैं बेबुझ सरल
कि खोले कपाट बंद हुए
चेतना के
ओर मानव बन सके
एक बार फिर मनु ।
छगन लाल गर्ग ।

Tuesday, March 22, 2016

अज्ञात रहा।

अज्ञान का विस्तार
अहंकार प्रवंचना में
घने अंधकार नहीं सुझता
रोशनी का आना
मेरा जीवन
विकलावस्था का यथार्थ
सुख क्षणिक छलावे सा
कुंठित करता जाता राहें
लक्ष्य तोडते जाते
अस्तित्व मेरा
नहीं मिल पाता प्रकाश
कि देख सकूँ
सुख की डगर स्थिर
नहीं स्थिर सुख सत्य
ओर सत्य होता भी
अज्ञात अकल्पित
जडता पल्लवन चलता
 साथ साथ
मिटने बनने का क्रम
क्रियान्वयन संदेश
 वहीं अंकुरित होता
अव्यक्तव्य
ओर होती रहती हैरानी
अतीत नहीं देखा कभी
घटित होते
वह आज नव आकार से
अंकुर लेता
संचय जीता निरंतर
कल नहीं था
वह हैं विद्यमान आज
रहेगा यह भी संचय
अनिश्चितता का सार
कच्ची पृष्ठभूमि जीवन
अहंकार का बोझ पाया
अतृप्त आँकाक्षा लिए
व्यतीत होता
आज मानव जीवन ।
छगन लाल गर्ग।

खोने दो ।


खोने दो
अपने लय अपने भाव
घट भीतर घटता रहे
मेरा अपनापन
मैं नहीं रहे मुझमें मेरापन
डूबता हूँ अगर
अच्छा रहेगा कला के लिए
डूबने दो
तुम मैं बने मत रोको डूबने से
भीतर बहने लगा
लीन होने लगा स्व भूला
एकाग्र हुआ जाता
अपनी भाव दशा
प्रस्फूटन होता जाता नव बोध
नया गीत नये अर्थ देता
निरूद्धेश्य अमोलक
काव्य अपना सा
ध्यान आता
चेतन स्वाद बन निराला
नहीं लक्ष्य
कीमत लगे स्व की
यह सृजन पुत्र सम
दिव्य अलौकिक राग भरता
चेतना में
निश्छल निरीह निष्पक्ष निस्पृह
रहने दो ।
छगन लाल गर्ग ।


Monday, March 21, 2016

अंधविश्वास पर नहीं ।

अंधविश्वास नहीं
व्यवहारिक रहना जरूरत
समय की
परंपरा के निर्जीव संस्कार
माँजने जरूरी
वृहतर संबंध वस्तुओं से जुड़े
संवेदना शून्य संबंध
अब हो रहे मुर्दे
अब नहीं आता फर्क करना
दीये ओर सूर्य रोशनी बीच
बेबूझ हुआ जाता
वस्तुओ के स्वार्थ भरा
जिन्दगी का गणित
समस्त दर्शन विचार नहीं
केवल भ्रमित पंथ की
अंधी उतेजना
मनुष्य हुआ जाये कैसे
अंधविश्वास का शिकंजा
अति विस्तृत
कास आँखें सत्य देखे
फिर उन्मुख हो भावी
सीखे मानव मानव बन
समर्पित होना
सत्य पर करे भरोसा
अंधविश्वास पर नहीं ।
छगन लाल गर्ग।



आनंद उदधोष ।

अस्तित्व संग अपनत्व बिना
स्वगत प्रवृत्ति विलग अहसास
अनवरत अनुभूति पाता
कर्ता हर कर्म बन चुका
अपनत्व विमुख अधिकार शेष्टा मे
स्व अहं भरता परिपुष्ट होता विकार
नित्य तनाव चिंतन विचार
जिनसे व्यक्तित्व का नहीं रहा
अनिवार्य संबंध
आज बने तपन मे सक्रिय
छुटकारा चाहता अहं ताप से
नहीं राहत किये कर्मों से
कुछ बचता नहीं अनकिया
अब तो ढोना खीचना ही
अनगनित दुखों का भार
उठती आवाज भीतर से
सुनता बैठा शांत होकर
नहीं स्वभाव तुम्हारा उदासी
मानो ना मेरा
छोडो हठ प्रभुत्व अहंकार
होने दो स्वगत
मानो वहीं अंतर की आवाज
फिर दिखने लगेंगे
प्रसन्नता के नव कुसुम खिलते हुए
आने तो दो भीतर का
आनंद उदघोष ।
छगन लाल गर्ग ।

अटल सत्य ।

ब्रह्मांड ब्रह्म अटल सत्य
अनंत यात्रा पथिक हम
रास्ते सम विषम अनुभूति देते
जटिल बन स्वीकार करते
अपना अहं
ओर यही मिथक गति देता
कदम बढते असत की ओर
मिल जाये राही
अंगी बन जाते अपनत्व भरे
सहारा बनते
कि अनजाना दोष पाकर फिर
तडप प्राण भर बिछुड़ जाते
आह फिर वह वेदना भी
जख्म बन जीवन नासूर देती
स्वप्नवत यह आवागमन
जागना सोना सभी समान
दोनो दशा ब्रह्म रहस्यमयी
हम केवल साक्षी रहे
प्रत्यक्ष पथिक हूँ थका थका सा
अनवरत घना अब तक चलता गया
राहों ने संकेत दिए
अपना अंगी भ्रम मे बिछुड़ गया
सत्य अदृश्य अलौकिक साथ
व्यतीत फिर अंकुरित हुआ
विनोद बन नव अवतरण पाकर
प्रेम पल्लवन शास्वत अवतार लिया
आओ जग के सब मिलकर आओ
राग अमोलक रागिनी गाओं।
छगन लाल गर्ग ।




Sunday, March 20, 2016

आने दो ।

मत रोको नहीं रूकती
जगत जो भरी महक
नाना रूपिणी श्रृंगारमयी छवि
आशक्त मधु मृदुल यौवन
उफान घना आनंद लिए
मत रोको नहीं रूकती
रोनक खुशबू ताजी ताजी
स्वप्न शील उन्माद घीरी बिम्ब
मधुरता सागर लहरायें
करो प्रेम पूर्णता पाओ
जी भर लो सौन्दर्य रस मादक मदभरा
हौले हौले अधर पान करो तुम
यह रूप मदिरा उसी का
नवरूप बनाया
रूक नहीं जाय प्रेम हमारा
बढे फैले जग मे छा जायें
हिलोरें आनंद बन उर्ध्व उछले
उस पार प्रभु शरणों को धो लें
लहरें रागिनी अनंत घेरे
प्रेम वेग नद मानव जीवन
रोको मत आने दो ।
छगन लाल गर्ग।

मनुजता ।

अंधकार रोकता कदम
ओर नहीं व्याप्त अकेलापन
बहुत साथी अंधेरों के
अस्तित्व लिए सहयोग आँकाक्षी
अब निर्भर पूर्ण मन हमारे
कि रूकना अंधेरो संग
साथी संग
निष्क्रिय बेतरावट बेहोश जिन्दगी
हमारे हाथ बिल्कुल
जीने की स्वच्छन्दता हमारी
पर दिखता जाता
अंधेरों को चीरता रोशनी का कतरा
चाँद तारें झिलमिल झिलमिल
एक अचेतन ध्वनि
गाती संगीत
ले चल मेरे प्रभु रोशन जहां मुझे
सुनते हो बडा कठिन
पर अटल सत्य
मानव का सत्य मनुजता
असलियत केवल रोशनी ।
छगन लाल गर्ग।

स्व प्रज्वलन ।


स्व प्रज्वलन
विचारों का मंथन कम
विध्वंस अधिक करता
आस्था से घीरे
सदियों से मिलते रहे
अंधविश्वास
अति गहरे घने धरातल
जीवन तल छितरे हुए
धधकते जलते रहते
विचारों की चिंगारी
चेतन होते ही
मिटता रहता मिथ्या
जमा असत्य
ओर नव अंकुर लेती चेतन
आस्था टटोलती सत्य
जीवन का
हर चमक प्रकटती अपनी तेजस्विता
ओर बाह्य दृश्य बन जाता
रूपक सौन्दर्य भरा सत्य
नहीं झलक मात्र
उस अनुपम की
देती बहुत भीतरी चेतना
कि जल उठे दीये अलौकिक के
ओर यह तुच्छ जीवन
बन सके धरोहर
अग्रिम पीढ़ी के लिए
अनुसंधान बाहर का नहीं
स्व संबोधित सत्य का होने दो ।
छगन लाल गर्ग।

Saturday, March 19, 2016

निर्मम स्वार्थ।

तनाव हैं यह
अधिक ऊर्जा का व्यय
अपने परिवार पोषण निमित्त
चाह से अनुकूल पैदावार
परम सत्ता का विशिष्ट अनुग्रह
संतोष छाया नैसर्गिक आनंद क्षण
एक कृषक के जीवन का
पर कुछेक पलों के बाद
उमडने लगते विपदाओं के बादल
साहूकार का बकाया
भाइयों का खाया अन्न चुकता करना
ओर इधर बैंक का नोटीस
खाद बीज का हिसाब ब्याज सहित
सारा उत्साह धूमिल हुआ जाता
काले घुमडते बादलों की तरह
ओर क्रोध भरी जलती आँखें
ईर्ष्या की
हिस्सेदारी भाइयों में
अपनी कमाई अधिक लगते ही
कहना शुरू
हमारा पीछला हिसाब होने बाद
कमाया अनाज उठने देंगे
पहले हिसाब फिर अनाज तुम्हारे
उदास के क्षण
मेहनती कमाई साथ लाई
देखता हूँ वसूली का
निर्मम स्वार्थ ।
छगन लाल गर्ग।

Friday, March 18, 2016

अधूरापन ।

कालातीत कर्मरत वर्तमान
तल्लीन हुआ अनवरत
संपूर्णता पाने
अतिशय आक्रांत अस्तित्व
दांव लगाता जाता
अस्मिता जीवन भर संग्रहित
मानव होने की पूँजीगत
मात्र यही लक्ष्य
मिट जाये जीवन का अधूरापन
नहीं हारता अंतिम श्वास
ललक का उफान वही
शिथिल अस्तित्व से पृथक
कामना का चेतन पुँज
जलाता जाता
नव अंकुरित पल्लवों को
इठलाती अबोध कलियों में
चेतन बीज जीवन के
लेना हैं लक्ष्य का ठौर
एक दिन
न रहे भीतर भाव मानवता
कि अभी व्याप्त हैं
अति भीतर मेरे अधूरापन।
छगन लाल गर्ग ।

अपनत्व मरीचिका ।

शायद यह भराव
मानवीय मर्म होगा
सुकोमल गात सा
नवनीत विकसित
अंतर्मन का सत्य
चाहता
भावनाओं का बिंब उभरे
अपनेपन में
ओर यह अपनापन केवल
जग का
काम चलाऊ दिखावा
दिखे समूह बीच
सराहना निमित्त
भीतर भरा भारी
घृणा भराव
उफान लेता नितांत एकांत
उगलता जाता
विष का धुँऑ
सबल होने का मद
देता उलाहना
अपनत्व सागर को
कि विषेला बन जाता
अमृत का दरिया
ओर बाहर बाहर उफान जहर
बन उभरती लहरें
भ्रमित सौन्दर्य प्रेमी
लेते आनंद
दृश्य उभरा
भीतरी सत्य नहीं हुआ उजागर
आज तक
कहीं प्रतिष्ठा मद का
यह अभिनय
संजोता रहता
सपनों का अपनत्व।
छगन लाल गर्ग ।


उपेक्षित ढलान।

अखरने लगती हर बात
तत्वावधान किसी ओर के
सुनाई जाती चाह कर
पास आकर
मेरी प्रकृति से मेल खाती
ओर तब सुनाने वाले मेरे अपने
सुनाते जाते तल्लीन हुए
चटखारे लेते
कही हथोडे से तोडते जाते
भीतर संजोया बचा खुसा केवल
जिन्दा रहने लायक स्वाभिमान
मेरा शिथिल श्वास लेते को
ओर मेल नही कर पाता
दर्द भरी अभिव्यक्ति तक
कही हल्कापन न झलके
सुना अनसुना दर्द बेअसर रहे
करता जाता अस्वाभाविक चेष्टाऐ
ओर नही होती तस्सली
अपने स्वाभाविक के तमाम उपाय
हुए जाते नकारा
जब हंसी के प्रबल ठहाके लगते
छोटे बडो के सामूहिक
अब हुआ पक्का
उम्र के साथ इज्जत भी
धीरे धीरे विलय होती जाती
उपेक्षित वातावरण मे
अंतिम सकारात्मक प्रयास
केवल शुद्धता भरा मौन
यही सार यही जीवन परिणाम
जिन्दगी भर की उपार्जित कमाई का ।
छगन लाल गर्ग ।

Thursday, March 17, 2016

बदलते अहसास ।

समय रहा अपना कभी
जब अहसास तरंग बनती
सोच मे अंतर करता महसूस
दुनिया का दर्शन अनजान दिखता
पहले का जीया एक क्षण नही पाता
इस समय जिसे कहता अपना
खुशियो के लम्हे
लंबी अवधि के बाद
बदल चुके मुझे
कहां हूँ अब मैं वही
विगत भूला बूरे स्वप्न की तरह
इतराता हूँ अपने पर आज
मेरा समय
बाहरी सत्ता का सौंदर्य भी
सुख उपभोग मदभरा रसीला
भीतर घूटता तडपता
ओरों का दर्द अब भस्म हुआ
नही दिखता घने प्रकाश मे
ओट मे सिसकता अंधेरा
करवट सत्ता सत्य लेने से पहले
गुम जाते अंधेरो के दर्द
ओर यूँ ही तूफान झेलते
बिखर जाते जिन्दगी के अपने क्षण
चुराये छलावा देकर
आखिरकार भुगताना रहेगा
तुम्हारे लिए बाकी अंतिम तक ।
छगन लाल गर्ग ।

समर्पण यह कैसा ।

राग रमणीय रंग भरता
अदृश्य ध्वनि संग
रस के कतरे
घुल मिल जाते कानों में
फिर भाने लगता
यह लघु जीवन
अंश बन जाता
सुख का अथाह दरिया
रस भरा
ओर डूबने लगता
सर्वस्व
नही रहता कही मैं
विलय हुआ सागर
बन गयी  बूँद सागर
विराट हुआ जाता हूँ
मत कहो मुझे पदार्थ
बहुत विलग आकार मेरा
नही जीता संसार अधूरा
बन चुका हूँ पूर्ण
विस्तृत असीम
यह पूर्ण
 सरल स्वीकृत समर्पण मेरा
उस विराट सृजक प्रति
समझ भरा नही तनिक भी
तनाव का छाया
खो चूका संसार
हो चूका रूपांतरण मेरा
विभोर  उन्माद गाता निशब्द
आह समर्पण यह कैसा ।
छगन लाल गर्ग ।

सृजन सत्य ।

मकसद निर्णीत कला
बनता रहा
अहिस्ता से आज का सृजन
समर्थ सक्षम सत्ताधारी
समाज संस्था ओर समुदाय
निर्मित कर
प्रतिष्ठा पद ओर पैसे की लालसा मे
अहंकारी पदार्थ प्रेमी
खडे घेर चुके जमीं साहित्य सृजन
अभिव्यक्ति की मौलिक अभिव्यंजना
नही रही
आत्मीय चेतन दीप नही जलता
कि रोशनी करे अंधेरे भीतर के
अंधकार के काले बादल
घिरे हृदय गगन
ओर रोशनी की जगह वासना के नद
का जुगनू चमक देता
हर अभिव्यक्ति मे
कमाऊ भाव दशा मे डूबा आज
सृजन का पहिया
नही निकल पाता दलदल से
नियंत्रण से बंधी हमारी अभिव्यक्ति
कैसे कहला सकेगी सृजन सत्य ।
छगन लाल गर्ग ।


Wednesday, March 16, 2016

रजनी मोह ।

अब नही रही आस
उजालो की
अधिकांश जी चुका
जग के उजाले
हर रश्मि देती रही
नया बोध
हकीकत
नहीं बन सका
हर बोध
क्षण का
हर अणु लेता जाता
करवटे
नहीं पहचान मे
आ पाता
समय का घूमता पहिया
फिर
बोध ओर क्षण का
कभी नहीं रहा
साथ
दोनों चलते
ताउम्र अपनी गरज
ओर मैं घसीटता रहा
नित्य
वक्त के कदमों तले
रोशनी के कतरे
नहीं बन सके मेरे
अहसास होता रहा
अंधेरा जीवन पर्यंत
हर वक्त हर पल
यही अनुभूति पाया
जीवन
नहीं चाहता उजालों से
कोई आस
अच्छा लगने लगा मुझे
रजनी मोह ।
छगन लाल गर्ग ।

याचक हूँ मैं ।

अंकुर जीवन मूर्त
प्रस्फूटित धरा
स्व साकार हुआ
यह कहना ठीक
धरातल के सीने का
छेद भरा
उर्वरा भूमि ममत्व साकार बना
मेरे तन से
ओर शुद्रता मेरी अहंकार भरी
दमन करता स्वभाव कहता
कि नहीं क्षमता कहूँ
कि चीर कर उसे
सृजन पाया
ओर पनपना मेरा सामर्थ्य
सच नहीं यह
जीवंत क्षणों का
उपभोग
नहीं स्वयं की सामर्थ्य
प्रकृति का हर अणु
विकास मे रहा
आधार मेरा
रक्षक मेरा
अब अनुभव कहता
मात्र याचक हूँ मैं
ओर मांग करता
कृपा दृष्टि दो पहचान की
सत्य असत्य की
आँखें दो कि
देख सकूँ पर पीडन
ओर फिर
कर सकूँ याचना
सृजक से मिले
हर जीवन को
उसका अधिकार ।
छगन लाल गर्ग ।


बनना सिखूँ ।

 हूँ मैं इस क्षण का सत्य
संसृति क्षेत्र में गुँजती आवाज
सुनता सुनाता मैं
अभिव्यक्ति माध्यम जोडता
ओरों के साथ
ओर पाता हूँ अहसास
क्रिया प्रतिक्रिया सीमित
सक्षमता की हद तक
परिपक्वता पाया नहीं
सृष्टि संरचना मर्म पढता रहा
पुस्तकों से
अनुभव लगते बदले बदले
नहीं देता ज्ञान का आलोक
रश्मियों के कतरे
कि रास्ते बने परिपक्व
हर बार करता जाता भूल
नये सृजन का सत्य
जीवन को देता
नित्य नया रहस्य
आलोक नया घूलता नवाचार
ओर सौरभ झरता नित
नये सन्दर्भ देता जीवन के
खुद साधने लगता अब
संसृति पग चलता हर चिन्ह
मेरा स्वयं का बनना मिटना
ओर फिर पाता अहसास
इसी तरह लगता
बनना सिखूँ मानव ।
छगन लाल गर्ग ।


धुँधली राहें।


साफ सुथरा शरीर
धवल धारित श्वेत वस्त्र
सौरभ स्व यशस्वी यौवन काल
त्रिगुणोतम मानव
सृष्टि रचना का श्रेष्ठतम
अब मंजता हुआ
अपने स्वाभाविक रस से भिन्न
नहीं आपूर्ति संतुष्ट ईश्वरीय
स्वविवेक का अहं
विज्ञान संश्लेषण क्रियाओं में
स्वंभू बना
नहीं आस्थामय राग जड बना
मूर्त अनुभूतिओं का साक्षी
न्याय की तरह
सुखता जाता भीतर
गहन शुष्कता की आग को
देता जाता हवा
विद्धुत पंखे की तरह
तलाश करता उसी में
शीतल हवा की जींवंत नवल मधु स्मित
आँकाक्षा आनंद भरी
अनंत खोज जारी निरंतर
राह का अन्वेषण भूला
गलत गलियारों में
अणुओं के अस्तित्व में खोया
आज प्रबुद्ध चेतना शिरोमणि
भावी नहीं अब रोशन
कि दिखाई दे अग्रिम राह ।
छगन लाल गर्ग ।

क्या हो ।

आयु का उतरार्द्ध
देहिक विडंबनाओं से होता वाकिफ
सरकता जाता ओर नजदीक देह के
मन से भी सचेत हुआ सा
हर अंग प्रत्यंग देता अपनी अपनी
विकल थकान की आह
ओर मैं अनमना सा
स्वभाव लिए करता कोशिश
सुनने की
अनेक व्यथा स्वर उभरते
प्रति अंग विलग गाथा
चाहते सुनाना
जैसे होता रहा हर बार विगत मे
ओर करता रहा शरीर का
एकमेव हुआ अबतक का जीना
अब सुनता तो
पर चेतना सामर्थ्य हीन
प्रबोध पाती अचेतन का
छूटना चाहता जर्जर दशा
असंभव हुआ
उतरार्द्ध में तन का मोह पालना
ओर अब कहना ठीक
विकलता तुम्हारा आज का सत्य
बस भुगतना ही सच
अनंत विनय जोड़ो ओर
करो प्रतीक्षा देखें क्या हो ।
छगन लाल गर्ग ।

Tuesday, March 15, 2016

उष्णता।

नहीं रहा ठंडापन
मृतप्राय अतीत जीना
नहीं आता
जबकि बार बार दौडता मन
अतीत की खाई
जहाँ हजारों असत्य
कलुषित कालिमा घेरे ढेर
स्पंदन हीन
अतिशय दुर्गंध देते
समय की करवट साक्षात सत्य
मूर्त करती
ओर मन विगत व्याप्त
कटु यथार्थ से विमुख
चाहने लगता विगत सुहाने पल
कैसे हो यह असंभव
नहीं रही अतीत मे उष्णता
मृत्यु हैं अतीत
केवल ठंडक
चेतना की चिंगारी भी
केवल वर्तमान मे
मन जंगल के अतीत
जलाकर करती राख
ओर भरती जाती जीवंत क्षण
चेतना की उष्णता ।
छगन लाल गर्ग ।

चिंकनाई।

आवाज के साथ
दर्द की चीरती सी लकीर
उभरती टखनों में
रूकता हूँ दर्द सारोबार
चक्कर खाता
गिरने से संभलता लेता सहारा
लकड़ी के  डंडे का
अब आगे चलना
सामर्थ्य नहीं
सोचता बेठता हूँ
निर्मित दीवार की
नीव उठी ऊंची
कैसे होगा आगे निश्वास उठती
रोकता हूँ
दृष्टि डालता बेतहासा दौडते
सडक पर वाहन
सिरहन ले लेता उठता
चिकनाई के अभाव मे
घुटनों का दर्द रहेगा
याद आता डाक्टर का कथन
झटक लेता हूँ विचार
ओर झटका देता देह
बढता हूँ आगे
बदला लेता देह से उसके
आलस्य गुजरे विश्राम का।
छगन लाल गर्ग ।

अब रहने दो।

अब रहने दो
फिर कहती हो नही
तिलमिलाती हो रात भर
दर्द भरी आहें
रात भरी सोने नही देती
ओर तुम्हारी कराहें
भीतर तक कसोटती रहती
रात दिन
तुम्हारी बहु आधुनिक
नही जानती शायद
रसोई काम
अच्छा रहा तुम्हारा जानना
यदि सीखे
पर अभी तक दशक से
कोई ललक पाई नही
केवल काम करते करती अवलोकन
तुम्हारा
नही उम्मीद अब की रूचेगा उसे
रसोई का काम
ओर तुम्हारी हिम्मत देने लगी जवाब
क्या हो
अच्छा होगा उनसे  आशा छोड
ढूँढ लो कोई कामवाली बाई
अब तुम्हे क्या
यदि होती निन्दा बहु की
हिम्मत दे सके तुम्हें तो
होता रहे आपसी समझोता
पर मुझे तरस आता
हालात तुम्हारी देखकर
कोई तो उपाय हो ।
छगन लाल गर्ग ।


दुर्गंध ।

ठीक रहा
इस कदर लडना सगे भाइयों में
दोनों ओर से नहीं कमी
गंदले शब्दों की
मां सामने बेबाक बोल
शर्मन्दगी सीमा लाघंते
ओर अच्छा पढ़ें लिखे दोनों
देते हर लब्ज के साथ सबूत
अहंकार लिपटी भद्दास
कुलीन घर की कुलीनता
कलंकित होती
मात्र संम्पति का बँटवारे का
माँ का भावना भरा निर्णय
कि बेरोजगार छोटा भाई
माँ के रहने तक
लेता रहेगा माँ के हिस्से का हक
ओर माँ रहेगी उसी के साथ ।
छगन लाल गर्ग ।

Monday, March 14, 2016

स्वबोध ।

देह सौन्दर्य
अपरिचित पर आशक्त करता
नयनों का सफल साक्षात्कार
अपनत्व की चाह भरा
सर्वस्व अर्पित आतुर
ओर सत्य साक्षात
अस्थिरता मोह बन सरकती
अंजाम आकुल आनंद निमित्त
ओर उधर इतराया योवन मद
कटाक्ष देता करता उत्तेजित
वासना का पेगाम बन
क्या हो विवेक नहीं
कुंठित मनोदशा का विभत्स
कब कहता मानवता भी
जीता हैं स्नेह
नीरा कोलाहल छाया
भीतर बाहर
पनपाना चाहता इस कालिमा
स्व बोध का प्रकाश पुञ्ज
प्रतीक्षा रत हूँ
शायद अंकुर फूटे शुद्धता लिए
निःस्वार्थ स्नेह ।
छगन लाल गर्ग ।

भीतरी नरक।

अत्यंत लालसा सुख
प्रबल आज युग सत्य
नहीं चैन रात दिन
मात्र चाह भौतिक सुख निमित्त
ओर मकसद का वेग
आँधी सा उजाडता जाता
कच्चे ढहाता घौसले
बेजान सुनसान परसता सन्नाटा
अनेकानेक चहकते जीवन
बिखर बिखर टूटते आँधी की मार
ओर तृष्णा पाती विस्तार
भौतिक सुख
अहसास उसी क्षणों का
घेरता चेतन को
कलुषता भरा नरक विस्तृत
लेता आकार हृदय
बढते सम्पन्नता के मस्तिष्क
खोजता ओर उपाय सुख
ओर यह विज्ञान देता जाता
अलौकिक सम संसाधन
बढते संपन्नता
भीतर बढती जाती विपन्नता
ओर यह बढता रहा
भीतर का विभत्स नरक बना ।
छगन लाल गर्ग ।




गहरापन ।

बहुत जरूरी हो चुका
जिन्दगी जीने का
रखना हिसाब किताब
नहीं रहा भरोसा
खुद पर आदतों को लेकर
पता नहीं कब
रहना पडे विवश जरूरतों से
ओर भ्रमित करते पोस्टर विज्ञापन
कर ले कब्जा कमाई पर
उधर नूतन सौन्दर्य देते
अतिरिक्त जीवन जीते
टी वी सीरियल के पात्र
भार देते गृहस्थी पर
विश्वास ओर व्यवहार पर
करने लगे आघात
कि नहीं आता सत्य कहते
या कि करते
डगमगाने लगते आस्था के स्तंभ
डर के छायों मे
गुजरती जिन्दगी कब ढह जाये
आधुनिकता के प्रभाव बीच
नहीं कह सकता
अच्छा रहे हर व्यक्ति का श्रेष्ठ रहे
गहरी सूझ बूझ ओर
समय की हर करवट पर
पहेलु पलटने का सीखे
गहरापन ।
छगन लाल गर्ग ।


Sunday, March 13, 2016

हिस्सेदारी ।

अतीत का अनंत
नही छोडता पीछा
आकारवान होने लगता
 तस्वीरों के साथ
विगत परिश्रम झकझोर कर
अकथ वेदना देता अनायास
लंबे  अंतराल बाद
कोई परिणाम नही पाया
परिश्रम का वक्त हुआ बरामद
अमुल्य जीवन के सुनहरे क्षण
गूढ मेहनत तले बीते
गया  ऊर्जा भरा यौवन
अध्ययन मे
रात दिन संलग्न प्रतियोगी परीक्षा
तैयारी हर पल हर बार
क्या हो
सवाल भी बडा भविष्य जुडा
ओर उधर
प्रबल दावेदार सक्षमता की दिव्य कसौटी
धारक मारक हमारे  अरमानो के
व्यवस्था से जुडे समर्थ उम्मीदवार
धता बताते पढाई की पराकाष्ठा को
लगाये जीत अपनी झोली
हम धैर्यवान परिश्रमी
आज भी वही करते
पीछले  एक दशक से
अब हाँफने लगी धैर्य की सीमा
शायद शामिल हो सके
अच्छे दिनो के किसी अंश के
हिस्सेदार हम भी ।

इर्ष्या नही यह।

अनंत आकांक्षा
प्रबल होती जाती मद्देनजर
निगरानी करती
आसपास की जमी
बहुत छोटा लगता अस्तित्व
खुद का बनिस्बत खटकते
लोग बहुत  ऊंचापन लिए
अब नही भाता
पूर्व हृदय समाया अपना घर
कितना दिया अबतक
स्नेह पारावार
घर का हर सदस्य संतोष जीया
खूब पहले
फर्क  आया अभी
जब से विशालकाय भवन
ऊँची दीवारो से
झरोखों की मोहक सुंदर शिल्प लिए
हुआ शोभित बिल्कुल सामने
नही रहा वस मे
खाना पीना सोना
प्रति पल देता रहता संताप
असमर्थ क्षमता की
ओर मन नही मानता असमर्थता अपनी
कांटा बन चुभता अब
विशाल वैवाहिक देता पराया भवन
क्या कहूँ इसे
केवल तृष्णा की भूख
नही कहता
इर्ष्या नही यह फिर क्यो हुआ जाता
जीवन अशांत ।
छगन लाल गर्ग ।

आह घुली ।

व्यक्तिगत विडंबना
बढाती भार
परम ताप पाता अहंकार
निखरता परिपक्व बन व्यक्तित्व
बखान योग्य 
हर अवसर पाता वर्चस्व
पर पीडन संवेदना
ओर अधिक सालती
आत्मा मे उभरती जाती
जलते लावे सी ज्वाला
चलते कदमों
हर दिशा तलाशती दृष्टि
ढूँढता हूँ
सूजन फूटते पैरों से संघर्ष करता
जिन्दगी की श्वास पाने निमित्त
हाथ फैलाया
कल वाला भिखारी
अनायास देखता हूँ एक भीड़
चौराहे पर स्थित नीम
विशाल वृक्ष दीर्घाकार हुआ जाता
भीड़ से घीरा
ओर हृदय मे एक जलती सी
वेदना की टीस
लकीर खिंचती दबाव से
जीगर चीरती निकलती
नहीं रहा वह
विजय का डंका बजा
एक बार फिर
समर्थों की व्यवस्था का
अंतरतम मे तम
विशाल आकार लिए
अतिक्रमण करता ओर
जीने के संघर्ष मे
नथूनों से श्वास प्रक्रिया
रफ्तार बढ़ने मे तल्लीन
लगता आह घूली
जाने वाले के संग।
छगन लाल गर्ग ।



Saturday, March 12, 2016

आकर्षण ।

सौन्दर्य देता खिंचाव
भीतरी ऊर्जा
उफान भरती रागमय
उठने लगते आनन्द के रस तंतु
यही खिंचाव
बन जाता आकर्षण प्रेमिल
ओर तभी जन्म लेता
समर्पित होने का भाव
समस्त अस्तित्व सहित
यह दशा क्षण अमिट बन जाते
दृश्यवत भी अदृश्य भी
ओर जीवन होने लगता चेतना शून्य
स्वयं से भी ओरों से भी
यह पल द्वेष देता
दूसरों से तुलनीय बनता
यही राग द्वेष जीवन का
उत्थान पतन
अतिक्रमण करता व्यक्ति
हो जाता पार
उपलब्ध होने लगता
निष्काम कर्म ।
छगन लाल गर्ग ।

आदमियत ।

अब हो गयी खोज
आदमियत
बाहर भीतर हर जगह
नहीं मापदंड ठोस
मानव प्रवृत्ति विश्लेषक
नहीं रखते उपकरण
गति ओर दृढ पदार्थ बीच
आदमियत मूल्यांकन
स्थूल ओर सूक्ष्म बीच
श्वास लेने लगी
नहीं आती परख जमाने की
फूल स्थूल घने दिखते
सौन्दर्य बिखरेते
नहीं पाता आदमियत की अहमियत
सुरभि का दरिया शुष्क पडा
रीता रेत बना
नहीं भीतर नेह की सरिता
ओर खोजे कहां पाये
आदमियत ।
छगन लाल गर्ग ।

सूक्ष्म परत ।

हर क्षण प्रतीत होता
अपनी विशिष्ट पहचान के साथ
समय की धार अत्यंत पैनी
चीरती जाती वक्त गूँथी अतीत दीवार
ओर पुख्तापन का दावा
होता रहता नग्न अतीत मिटता
अति सूक्ष्म अदृश्य बन
ओर वर्तमान अंकित करता
अपना सच नवनिर्मित
भीतर का अनुभूत होता जाता
साफ बेनिशान
क्षण चेतना शांत नहीं
बड़ी उतप्त जलाती जाती
जमा जमाया असत का मेल
ओर करती जाती आलोक
नव चेतन की सूक्ष्म तंरग
बसती जाती अंतर
शायद यह नयी हैं चेतन की
सूक्ष्म परत जिन्दगी की ।
छगन लाल गर्ग।


पात्रता ।

नहीं रखता कोई ढंग
पाने लायक विशिष्टता
अव्यवस्थित संस्कार जीता
बेहिसाब जिन्दगी
कद्रलायक हुनर नहीं पाया
मिल सके पहचान
सारे करतूत आम मेरे
बौनेपन की जिन्दगी मेरी
नालायकी के होते
नहीं हो पाता गुनाह विशिष्ट
ओर इसी निमित्त
नहीं रह पाती चिंता
सुख मिले कि दुख
बेढंगा हूँ मैं
बडप्पन के विष पीते लोग
प्याले भर भर
वहीं विष उडेलते मेरी ओर
पात्रता का प्याला मेरा
नहीं रंगीन
वहीं बडप्पन विष
आते ही मेरे प्याले बन जाता
अमृत
ओर जब लेता हूँ उपभोग
लगाता हूँ अपने होठ
मिट जाती कटुता मौत सी
युग युग की
ओर बहने लगते मधु के निर्झर
अंतर हैं पात्रता का।
छगन लाल गर्ग ।

Friday, March 11, 2016

रिश्तों का सच।


क्यों नहीं आये
समय समझ नहीं आया
इस परिपक्वता बाद भी
बड़ा ताज्जुब होता मूर्खता पर
ऐसे मे यहाँ आ जाते
हम करते कुछ
हालाँकि अभी तक सब कुछ किया
ओर करते
कमजोरी ओर गुच्छा भारी
विडंबना हैं
इतना कुछ हुआ खबर नहीं
थोथा अहंकार बाप का
हमें क्या
आना हो तो आ जाये
मैं नहीं जाऊँगा लेने
समझा क्या हैं मुझे
नहीं हूँ नोकर बाप का
गये जमाने
अब हम उनसे बढकर हैं ।
छगन लाल गर्ग ।

महा ज्ञान ।

असंख्य अनुसंधान
जटिल परिवेश रहते
ज्ञान पिपाशुओं की
भीतरी ऊर्जा
तन मन की
विकल दशा झेलते
तर्कों ओर तथ्यों का
सेतु
पूरे प्रांजल दृढ़ तत्वों से
बाँध कर प्रस्तुति देते
सारगर्भित सत्य की
तब लेते डिग्री
पी एच डी
फिर
पुख्ता प्रमाण पाये
करते
मीमांशा तथ्यों की
विचारों ओर भावों की
कहलाते
गरिमा पाते महाज्ञानी
पर ज्ञान यदि आया
या कि उत्पन्न हुआ
या कि सिखा
या कि जाना
बड़े फर्क देते हैं शब्द
सच्चाई बड़ी
कटुता भरी
महान के निमित्त
ज्ञान न तो
मद देता हैं
ना मूढता
ना अहंकार
ना तनाव
देता मात्र शांति
हो जाते हम
अजान निर्अहंकारी
लक्षण यही
ज्ञान से भरे ज्ञानी का ।
छगन लाल  गर्ग ।



नाजूक अहसास ।

अतिशय गहन
सत्य मार्मिक स्नेह
जब हो जाता
अति विरल
बन कर नमनीय
द्रव्य सा
प्रवाहित होता रहता
प्राणों का
मीठा राग बनकर
तब कहीं
प्रतिफलन पाते
स्नेहिल रिश्ते
मर्यादा ओर अहं से
गिरकर
बहने लगते जीवन के
समरसता भरे धरातल
नहीं होता संदेह
रिश्तों की पृष्ठभूमि में
समय परिवर्तन की
पवन
कभी ठंडी तो कभी गरम
चौंट करती जाती
हर स्थूल पर
देह बीच बंधे
राग संबंध भी
होते जाते प्रभावित
ओर
भरोसे के महीन सूत्र
हिलते थरथराते
पवन के धक्कों से
अंतस्थल विश्वास का
खूब गहरे मे
कण भर रहा
बीज संदेह
मिटा कहां
दबा रहा अब तक
विश्वास रहा
पर केवल शब्दों का
भीतर का
असली संदेह बीज
संसार की उष्मा से
वक्त की करवट तले
लेता
फिर आकार अनजान
जिसमें संतुलन की
समझ से
जीवन बन जाता भार
केवल रागात्मक ही
प्राण परख लेते
नाजुक जीवन का
अहसास ओर
मधुरतम से
यही मिलकर
प्राण कर लेता
परमेश्वर का श्रृंगार
अद्भुत हैं जीवन राज ।
छगन लाल गर्ग ।


Thursday, March 10, 2016

मंथन का सच ।


हर बात कहने से पहले
सोचना होगा
बडे होने का मापदंड
विश्लेषण पश्चात का संश्लेषण
पहले पचाना होगा
बिना स्वाद का
अहसास किये
जेसा भी बिना मुँह बिगाडें
तुला हुआ सच
समय की धारा पर नही
आवश्यकता की ऑच पर
पकने दो
ओर यदि फिर भी
कहना विवशता बन जाये
तो कहो
यह कहा तुम्हारा
तुम्हारे कारण नही
सुना जाता
अनुभव की दीर्घा भी नही
आधार
या बडे होने का
मान मन्वल भी नही
केवल इस गरज
कि कुछ उपाय
नही ओर
तुम्हें झुठलाने के
ओर हो सकने की
गुंजाइश छीपी
फायदा
यही कारण
तुम कर सकते हो तस्सली
अपने बडप्पन की
अवशेष जीवन का
अब यही
काल्पनिक ही सही
सहारा तो है ।
छगन लाल गर्ग ।




उदास पल ।

उदास पल
देते जाते चिंतन की उमस
खंगालने लगता जीवन
जीया अन जीया
लम्हों के बिम्ब फिर फिर
घेरते जाते
श्वास रफ्तार की सच्चाई
आवेश का कोहरा नही रखता आँखे
सौंदर्य पावनता बनती धून्ध सी
फिसलती सच्चाई हर पल बेहोशी में
ओर चेतन गहरे गर्त तले
खोता जाता स्वरूप स्वगुण स्वगत
ओर यह कालिमा
छोड जाती दाग गहरे
फिर नही धूलते किसी साबून
वह एक पल बदनुमा दाग देकर
छीन लेता जीवन
बिना होश का मानव जीवन
जीवन नही
बन जाता अभिशाप
जिसे जीवन शैली का सत्य
कसमकस भरी कसक देते रहते
उदास पल ।
छगन लाल गर्ग ।





मदांध मन ।

मदांध मन मेरे
मत मद मार मे ढहो
उतरो ना तनिक नीचे धरातल
सिंहासन से
नहीं औकात तुम्हारी
मानवीय कमजोरी अडचन भारी
मेरे मन तुम मात्र
बूँद सागर की
नहीं हो सागर
छोड़ो भ्रम का मायिक जाल
तुम क्षुद्र विराट का कण
उतरों सिंहासन से
काल्पनिक हैं यह
सत्य शासन नहीं तुम्हारे हक
खाली हो जरा
देखते नहीं बहती नद
अपार आनंद
धरातल के हर स्थल
अकारण बहता
जीवन भरता निर्दोष निर्मल अस्तित्व
पाओ ना बहते संगीत की
मस्ती अलौकिक
प्रयास मात्र इतना
उतरो मद सिंहासन से नीचे
बनो पावन बाल मन
मेरे मदांध मन।
छगन लाल गर्ग।


Wednesday, March 9, 2016

मुक्त हो ज्योति ।

सत्य अनुभूति
साक्षात्कार
व्यक्ति स्वयं का
अखंड ज्ञान ईश्वरीय
अज्ञात रहा
किसी समुदाय का
सत्य यह
नहीं कर सकते
स्वीकार हम
असत्य ही हमारा सत्य
भीड़ का अनुकरण
देता संबल भी स्थूल सत्य भी
नीजता नहीं यहाँ
लाखों की गवाही
देता सत्य यहाँ
केवल आत्मा की
साक्षी नही
ओर अजूबा यह
इस अलौकिक दिव्य
सज्यौति का
प्रस्फूटन होता
आत्मा से
परमात्मा निमित्त
ओर हमने इसे
पृथक पृथक
भीड़ भरे समूह मे
रोके रखा
ईश्वरीय ऊर्जा को
आत्मा की
ज्योति यात्रा
परमात्मा तक
रोक रखा हमने
भारी भीड़
समूह बनाकर
मत रोको
इसे अब तो
मुक्त हो ज्योति ।
छगन लाल गर्ग ।

बहना ही हैं ।

यहां नहीं ठहराव
अनुभूति भिन्नता भम्रदाय
दृष्टिवत प्रत्यक्ष भी
विभ्रांत
हर स्थूल यहाँ
केवल अहसास में
लगता स्थित
बहुत सूक्ष्म भीतर ही भीतर
व्यतीत होता
परिवर्तन के  जर्जर अणुकण
पाते बिखरावों की नवीनता
सन्नाटा
इसी बात का
परिवर्तन से
पूर्व की नीरवता
कहती समझ देती
नहीं तुम नहीं
दृढ़ विचारों का ठहराव
जगत शब्द
कहता अपना
अस्तित्व भेद हर पल
आता जाता
हर क्रिया का
आरंभ अंत
निस्सारता मे
सार का भेद
प्रकृति का हर अणु
अनुपमता के मोह
विभ्रम भूल
समझ आता नहीं
निस्सार का सार
अति संकरी
क्षण की चाल
सरिता नीर सा प्रवाह
अनंत रही यात्रा
पहुँच मंजिल पाना
नहीं  हाथ
हाथ केवल इतना सा
बहना ही हैं ।
छगन लाल गर्ग ।

Tuesday, March 8, 2016

भीखारी रहा ।

नहीं भरता अभी तक
अभिलाषा पात्र
हर संभव
पाने के बाद
अधिक आकूल होता जाता
चाहत की तृष्णा
अमिट विपन्नता लिए
उजागर होती
दैत्य बना
ओर हृदय वृत्ति पलटकर
बन जाता पिपासा का
स्थूल बिंब
संदेह पनपने लगता
स्वयं का अपनापन
पीता रहता
बेहोश प्यासे के
नीर की तरह
नहीं मिटती तृष्णा
अंतिम पडाव भी
सब कुछ दिखता
ओर कहती दुनिया
फल पाये सफल मानव
पर हृदय नहीं मानता
कि संतुष्ट हूँ मैं
अंत समय का
सच यही
भिखारी ही रहा मैं ।
छगन लाल गर्ग।

मिटाऊं कैसे ।

नहीं मिटता
रस देता अहंकार
बडप्पन बहुत देता मजा
खूब मेहनत लगी
पुख्तापन पाने मे
सारी उम्र लगा दी हमने
इसे बनाने सजाने मे
नाना रूप लिए इसने
कभी भवनाधीश कभी पदाधिकारी
कभी सत्ताधारी
ओर भी अकथनीय रूप
करता रहा अभिनय
आ चुका समय सीमा के मुहाने
जीवन बाग के अहं पौधे
सहेज कर पनपने दिये
बड़ी अडचन अब
स्वयं का बनाया संवारा
मिटाऊं कैसे ।
छगन लाल गर्ग ।

झूठा सत्य ।

अब हो चुके भेद
नहीं रहा सत्य अटल
अंतर आया हूई प्रगति
अब झूठ के कंधों पर
शोभित होता सत्य
बिना झूठ का सत्य
अस्तित्व खो चुका
नहीं चल सकता प्रगतिशील युग
ओर यदि भूल वस
लिया सहारा सत्य का
रूक जाती सभ्यता ओर संस्कृति
ओर मानवता तोडने लगती
अपना जीवन आधार
अगर खतरा सत्य का रहा
मर जायेंगे रोशन सितारे
नहीं रहेगी चिकनाई जीवन की
रूखा सत्य
मानव का विध्वंस होगा
रहने दो इसे
झूठ ही आज का सत्य
कहने की शैली
निखार निमित्त खुले प्रशिक्षण केन्द्र
ताकि मानव कर सके
प्रगति की असीम ऊंचाई तय ।
छगन लाल गर्ग ।

Sunday, March 6, 2016

शुभ रस ।

उदास पल नही घेरते
अकारण
सचेत रहते भी
नही होता
दृष्टिगत कारण
ओर यह जीवन
जीना होता
किसी अनचाहे
बोझिल क्षणों को
अनजान ढोते रहना
यही सत्य बना
आज का जीना
शायद भ्रांत बन गया
मेरा
जीवन दर्शन
नही समझने होगे
जीवन के अर्थ
नही कारण कोई
उदासी नही अनिवार्य
जीवन शैली बौझ नही
 पर हमने
हिसाब की किताब पढकर
बना ली
कठिन भी तुलनीय भी
जिन्दगी हमारी
थोडा होने दो
 चित का  राज
होते रहो शांत
आने दो
भीतर की आवाज
भावमयी स्नेहमयी रसमयी
ओर लो ना
सीख प्यार भरी
होते रहो निहाल
प्रेम से स्वयं भी
करते रहो
 शुभ ओरों का भी
तभी होती वर्षा आनंद की
ओर बहता
जीवन तल शुभ रस ।
छगन लाल गर्ग ।


ले लो तुम्हारा ।

बहुत भराव हुआ अब
छलकने लगा अहसानों का उफान
कब तक रखूँ नीचे गर्दन
दुखने लगा अब शरीर का रोम रोम
कृपा का विशालकाय दरिया
अब मुझे डूँबों देगा
नही तैर पाऊँगा नही आती तैराकी
बस करो नही  सामर्थ्य
तुम्हारे गहरे चुभते कटाक्ष
हर पल मारते है कौडे
बहुत गहरे अदृश्य भीतर के भीतर
ओर अब लगता
जर्रा जर्रा मरने लगा हूँ मैं
मरने का यह सिलसिला  अति नारकीय
फिर नही विश्वास ईश्वरीय मौत
इन्तजार बनी रहे
अधूरेपन में कहीं हो नाजाऊँ शैतान
नही चाहता बेहतर जिंदगी
तुम्हारे  अहसानों से भरी
अच्छा रहेगा ले लो तुम्हारा
चुकता हिसाब
रक्तसंबंधों की उम्र आजकल
अबोध वय तक का हिस्सा ।
छगन लाल गर्ग ।

Saturday, March 5, 2016

अहसान तेरा ।

अभी याद आया
बहुत दिनों बाद
अहसान तेरा
तुम भूल तो चुके अच्छा रहा
घटिया नहीं सोच तुम्हारी
अन्यथा आज
तुम्हारे सा सहारा
बिना मतलब अपने
नहीं देता कोई
सुनो
कहना मत किसी को
इसी तरह गुजरने दो
जिन्दगी की सच्चाई
क्या फायदा यदि तुम
सुनाते भी हो
किसी को कि तुमने
कि तुमने मेरे परिवार पर
अपना
 सब जमा लुटाया
ओर मैंने तुम्हें
समर्थ होने के बाद भी
कुछ नहीं लौटाया
नहीं मानेगा कोई
तुम्हारी बात
इस औकात पर
आज की
जो हुई मेरी वजह
आखिर
रिश्तों का यही तो
मतलब
कि लूटते रहे
खाली होने तक ।
छगन लाल गर्ग ।


यह बिखराव ।

बिखरना लगभग
तय रहता
हर बार जिन्दगी में
नहीं उपाय रोकना
असमर्थता
मात्र नहीं कारण
बिखराव
अनिवार्य शर्त
इकजाई होने की
नया अस्तित्व
पनपता तभी
जब बिखरता पुराना
ओर पुरातत्व
बिखराव बहुत मुश्किल
आशक्ति का हठ
समूची शक्ति लिए
तौड देता भीतर का ध्येय
नहीं मिल पाता सहारा
स्वयं का भी
अन्य का भी
यह मौह का राग
नवीनतम
रौशनी की झलक
तर्क ओर चिंतन से संभव
अच्छा हो
हम बदलाव से पूर्व
सचमुच तल्लीन हुए
नयापन का
पुख्ता विवेचन
तो करें
तभी
बदलाव का सच होगा
हितकारी
समाज व स्वयं के लिए ।
छगन लाल गर्ग ।

Friday, March 4, 2016

विपरीत संघर्ष ।

नही होता ऐतबार
खंडित मान्यता होती जाती
प्रतिपल विश्रृंखल कतार
लेती जाती आकार विकराल
 विकार है जीवन
कारण मात्र हुआ जाता
अहंकार
बनना निश्चित कर चुके मालिक
अस्तित्व के
बहते जाते विपरीत धार
संघर्ष चेष्टा से आहत हुआ जीवन
ओर शून्य संगीत हुआ जाता
समय ओर जीवन
शुष्कता का कर्कश जीवन
कहां पाये त्राण
पतवार पवन संबंध बने भी कैसे
खुलती नही पाले
आता आडे अहंकार का भाव
मन करता संकोच
ओर यही बन जाता जीवन
वेदना का कारण
छोडना होगा चेष्टा का अहसास
शून्य से उठने दो राग
आने दो जीवन मे मस्त पुलक
अनजानी सी अपनी सी।
छगन लाल गर्ग ।

Thursday, March 3, 2016

रिक्त हूँ मैं ।

विरक्त नहीं
रिक्त हूँ मैं
असीम
दीनता से ओतप्रोत
विरक्त सा जीवन
नहीं कुछ सार तत्व
कि इतराऊँ खुद पर
नहीं रखता पद कोई
कि अकड अहंकार हो
न ज्ञान का प्रकाश
कि ज्योति बिखरे
ओर रोशन कर सकू
अंधेरों की दुनिया
ओर नहीं
धन दौलत की खनक
कि हृदय हीन इमारतों का
बन सकूँ स्वामी
कुछ भी तो नहीं मेरे पास
बिल्कुल शून्य रिक्त
केवल तेरे नाम
सरकता तेरी ओर
यह शून्य जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।

जीवन बूँद ।

नहीं होता आभास
अपनेपन का
सर्वोच्च सत्ता रहते
अस्तित्व होते भी
नहीं होता आभास
यह देह यह प्राण
क्या रहेगा मेरा
अनुभूति नहीं कहती
कभी व्यक्ति वस रहा
उसका अपना जीवन
नहीं सुना
ओर सुना भी तो
अलौकिक
नहीं स्थूल तथ्य
कि अनुभव कर सके
देह इन्द्रियां
राग उभरते जाते
वेराग्य बन प्राणों के
ओर प्राण
संतप्त हो
बिलखने को आतुर
उस अनंत
अदृश्य के लिए
स्मरण रह जाता
प्राणों में शब्द नहीं
अब राग बहता
जीवन बन गया बूँद
सागर की
ओर हो रहा मिटना
नित्य का
समाता जाता यह जीवन
बूँदें बन सागर की ।
छगन लाल गर्ग ।

विकृत भाषा ।

प्रबुद्ध व्यक्तित्व
सुसंस्कृत परिमार्जित
आचरण शुद्धता
अनुकरणीय
आकर्षित गरिमामय
यह मानवीयता युक्त
परमार्थ
ओर जीवन का सत्यार्थ
अब
 कुलिन भाषामय नहीं रहा
शब्द वेदमय
परमेश्वरीय महिमा
जब उच्चारण
व्यक्ति करता
व्यक्तित्व ओर चरित्र
अभिव्यक्ति देता
शब्द हो गरिमामय
ऊँचाई स्थित
 प्रतिष्ठित भी विद्वान भी सतावान भी
बड़ी तेज गति से उतरते जाते
खाई की तरफ अति नीचे
गंदगी की दुर्गंध देते शब्द
ओर करते जाते
अपनी सर्वोच्चता का दावा
क्या होगा
बड़ी अनजानी
चिंता घिरती जाती
सत्य ओर सतभाषा
कब उकेरेगे
अपनी जुबान
मायुस ओर उदास
आज का प्रजातंत्र
निहारता
आँकाक्षा भरी नजर
मेरे देश के नाविको
सुनो भी जन की पुकार ।
छगन लाल गर्ग ।


Wednesday, March 2, 2016

लडों मत ।

लडते क्यों हो
यह अतिक्रमण होगा
मानवता का
यह समाज
मनुष्यों का
पढ़े लिखे
समझदार
मानव मनोविज्ञान
जानने वालों का
वहीं से बिगुल बजते
आपसी साम्यता मे
 गुणवत्ता
पहचान की
कसौटी करते
दुराव ओर श्रेष्ठता के
यह नहीं
 मानवीय सदाचार
अतिक्रमण को
तप मानो
कि विरोधी न हो
उस तट तक
जाना हमें
जहाँ बहती हो
भाईचारे व प्रेम की
गंगा
आओ ना साथ चले
अतिक्रमण करते करते
आपसी संघर्ष त्याग
पार चले जहां
ना हो
अतिक्रमण की गुंजाइश ।
छगन लाल गर्ग ।

वैचारिक हिंसा ।

अधिक प्रबुद्धता
दे जाती
वैचारिक संग्रहण
ओर बनते जाते
विभिन्न
वादों के समुदाय
जो अपने संग्रहित
विचारों का
करते हैं
प्रचार प्रसार
ओर
श्रेष्ठता का दावा
प्रबुद्धता
फिर लेती जाती
कट्टरता का आवरण
अपनी
अहंकार तुष्टि निमित्त
जब कोई
तार्किक विचार
बनता जाता
किसी समुदाय
या कि मेरा
तभी वह हो जाता
सत्य से च्युत
भी विमुख भी
प्रकट नहीं हो पाता
भीतर का अहं
आरोपित हो जाता
मेरा सत्य
आज हर प्रबल
शक्ति
सता से युक्त समुदाय
सत्य से विवाद नहीं
सूक्ष्म में
सता व शक्ति की सत्यता
का होना ही
विचारों की सत्यता
असली सत्य
आधार भूत
 सच्चाई हर अंश मे
अपनी सता रखती
सत्य को रौदते
सत्यता साबित
करते विवादित
घिरती जाती
आज की मानवता ।
छगन लाल गर्ग ।



दोहरान हूँ मैं।

 व्यक्ति रहना
सीखना होगा
अनंत प्रवाह बहती धार
जीवन नदी की
ओर हर प्रवाह छल भरा
नही होता आत्म सात
जिन्दगी की जरूरत
उभरती ज्वाला सी
निरंतर विशालकाय
ओर घबराहट लिए
नित्य बढता जाता
शान्त दमित करने
नही हो पाता यह
क्षमताओ का दंभ मात्र
नही हकीकत
कि कार सकूं समाधान
नित्य  उठती बाधाओ का
जटिलताओ का दौर लिए
टूटता जर्जर हुआ
अब बन  गया समन्वयक
लडखडाता
 संभलता करता हूँ कोशिश
जिन्दगी प्रवाह को
मिल सके  सहारा
विवशता वस
हर सबल से निभाता
विनयशिलता का ढोंग
बन जाता हूँ
 जीने लायक व्यक्ति
ओर उग्र हुए अहंकार से
विनय हुआ
लेता जाता छूट मानवता की
ओर स्व त्याग का
ढोंग कर
पाता रहता
 अहंकार रस भी
स्पष्ट ही नही
रहा व्यक्ति मैं
सीखना नही  आया
व्यक्ति बन जीना
केवल दौहराता हूँ
व्यक्ति होने का नाटक ।
छगनलाल गर्ग ।

Tuesday, March 1, 2016

अहसास मुझे ।

अजीब बोध संजोये
चल पडा जीवन यात्रा
सिद्धांत स्वीकार  लिए
विश्लेषण बिना
भीतर बहुत पाता रिक्तता
मेरा हर कृत्य
रहता समझदारी का प्रदर्शन
पर जानता हूँ मैं
सब करतूत मेरी झूठ भरी
नहीं तनिक भी ठावस
सत्य भरी
ओर सच का अहसास
करता भीतर
पाता हूँ सार तत्व
हर बात विचार
भावना प्रेम प्रार्थना सब कुछ
मात्र मेरी समझदारी
प्रदर्शन
भीतर भारी रिक्तता
नहीं हूँ सछ मैं
एक पूलिन्दा भर झूठ का
असलीपन मेरा
अहसास मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।


शून्य दृष्टि ।

नहीं पाता कहीं
शून्य दृष्टि सत्य भरी
परम ज्ञानी
बखान करता
अपना संचित ज्ञान
तत्कालीन सत्य से अछूये
बदलाव का सत्य
नहीं रहता पूर्वाग्रही
भेद आ जाता
समय की सापेक्षता का
ओर हर ज्ञानी बहुत भरा भरा
हजार हजार विचारों से
ओर करता जाता दावा
अपने होने का
अपने विचारों की सत्यता का
असलियत देखे भी कैसे
एक पर्दा ढक देता
सत्य साक्षात
पूर्वाग्रह का
ओर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करता
चिल्लाता जाता अधिक जोर देकर
समूह ओर झुंड बनाकर
अंधी भीड़ के साथ
नहीं हैं सत्य के साक्षात्कार की गरज
सत्य से असत्य को बडा खतरा
नहीं करता स्वीकार
सत्य
पूर्वाग्रह लिए हजारों  विचारों  के साथ
भरी ऑखो से चिल्लाता जाता
अपना दावा
नहीं आज के युग मे
साक्षात सत्य से साक्षात्कार को
शून्य  दृष्टि ।
छगन लाल गर्ग ।