Tuesday, March 29, 2016

प्रभु मेरे ।


प्रभु मेरे
मत पहुँचा देना
उस धरातल के कीचड़ मे
जहां दुर्गंध भरी हो पवन
ओर श्वास लेते
भा जाये गंध
यही से होगा मेरा अंत
आरंभ पतन की खाई
गिरते हुए देगी ग्लानी
कसक भरी दारूण यंत्रणा
सहूँगा कैसे
ओर इस संसार में
सबसे बुरा भाव आत्म चेतन मे
स्वयं के प्रति निंदा
आत्म निन्दा
फिर कैसे पहचान पाऊँगा
मेरे प्रभु तुम्हें
मेरे भीतर तुम रहते भी हो
करूँगा कैसे
विश्वास आत्मा परमात्मा की अद्वेतता का ।
छगन लाल गर्ग ।