संवेदनाओं से होता
भीतर का स्पंदन
अति वेग लिए
तंरग उठती गिरती
संचलन होता सक्रिय
देह का
अन्यथा नहीं रहता मैं
आकार पाता हूँ चेतन
देह नहीं स्थिर रहती फिर
अस्तित्व पाने लगता
अपना मौलिक वर्चस्व
चेतना के दीये देते जाते
सामर्थ्य का उजाला
ओर मन की वीणा
लेने लगती संगीत रस
अनजान स्मृति भरा
शायद बहुत फासलों मे
जाना पहचाना
ओर अपना भी
छूटा भूला सा
आह कितने मोहक अंदाज
अस्तित्व लिए सुशोभित
आँखों का यह तृप्ति दीदार
सौभाग्य का वरदान
अलौकिक का
जो बरसता जाता
लौकिक हित
ओर तभी
यह देह पाती आकार
मंदिर का
ओर तभी जल पाते चेतन दीये
अदृश्य परमात्मा के ।
छगन लाल गर्ग।