Thursday, March 3, 2016

जीवन बूँद ।

नहीं होता आभास
अपनेपन का
सर्वोच्च सत्ता रहते
अस्तित्व होते भी
नहीं होता आभास
यह देह यह प्राण
क्या रहेगा मेरा
अनुभूति नहीं कहती
कभी व्यक्ति वस रहा
उसका अपना जीवन
नहीं सुना
ओर सुना भी तो
अलौकिक
नहीं स्थूल तथ्य
कि अनुभव कर सके
देह इन्द्रियां
राग उभरते जाते
वेराग्य बन प्राणों के
ओर प्राण
संतप्त हो
बिलखने को आतुर
उस अनंत
अदृश्य के लिए
स्मरण रह जाता
प्राणों में शब्द नहीं
अब राग बहता
जीवन बन गया बूँद
सागर की
ओर हो रहा मिटना
नित्य का
समाता जाता यह जीवन
बूँदें बन सागर की ।
छगन लाल गर्ग ।