मदांध मन मेरे
मत मद मार मे ढहो
उतरो ना तनिक नीचे धरातल
सिंहासन से
नहीं औकात तुम्हारी
मानवीय कमजोरी अडचन भारी
मेरे मन तुम मात्र
बूँद सागर की
नहीं हो सागर
छोड़ो भ्रम का मायिक जाल
तुम क्षुद्र विराट का कण
उतरों सिंहासन से
काल्पनिक हैं यह
सत्य शासन नहीं तुम्हारे हक
खाली हो जरा
देखते नहीं बहती नद
अपार आनंद
धरातल के हर स्थल
अकारण बहता
जीवन भरता निर्दोष निर्मल अस्तित्व
पाओ ना बहते संगीत की
मस्ती अलौकिक
प्रयास मात्र इतना
उतरो मद सिंहासन से नीचे
बनो पावन बाल मन
मेरे मदांध मन।
छगन लाल गर्ग।
मत मद मार मे ढहो
उतरो ना तनिक नीचे धरातल
सिंहासन से
नहीं औकात तुम्हारी
मानवीय कमजोरी अडचन भारी
मेरे मन तुम मात्र
बूँद सागर की
नहीं हो सागर
छोड़ो भ्रम का मायिक जाल
तुम क्षुद्र विराट का कण
उतरों सिंहासन से
काल्पनिक हैं यह
सत्य शासन नहीं तुम्हारे हक
खाली हो जरा
देखते नहीं बहती नद
अपार आनंद
धरातल के हर स्थल
अकारण बहता
जीवन भरता निर्दोष निर्मल अस्तित्व
पाओ ना बहते संगीत की
मस्ती अलौकिक
प्रयास मात्र इतना
उतरो मद सिंहासन से नीचे
बनो पावन बाल मन
मेरे मदांध मन।
छगन लाल गर्ग।