Wednesday, March 23, 2016

मूढता ।


मूढता हुई जाती गहन
घने अंधकार में
बाहरी रोशनी नहीं पहुँच पाती
अधिक भीतर
केवल स्पंदन देती किरण
सुबह की
स्व स्फूरण रह जाता बाकी
भीतरी रश्मि बिना
बाहरी बाहरी टिम टाम देता
प्रतिष्ठा की रौनक
नहीं  सत्य पाई चेतना
यह आवरण बन बेठा
पक्की दीवार सा
तरल चेतना नहीं पाती राह
रोशन हो सके अंतरतम
चिर मोटा अंधकार
तह दर तह जमा
स्थूल देह का सौन्दर्य
वर्ण वर्ग लिंग का वर्गीकरण
अंधविश्वास का सहारा
यही आस्था ओर विश्वास
सत्य के मापदंड
अजीबोगरीब बोध बने
सुविधा का सत्य
ओर भौथरा गया दुनिया से
असलियत भरा बौध
कहां हैं सत्य
चेतना के दीये
बंदिशों में जलते
शुद्ध हवा बिना
दम घौटते बुझने लगे
कोई हैं बेबुझ सरल
कि खोले कपाट बंद हुए
चेतना के
ओर मानव बन सके
एक बार फिर मनु ।
छगन लाल गर्ग ।