Thursday, March 17, 2016

बदलते अहसास ।

समय रहा अपना कभी
जब अहसास तरंग बनती
सोच मे अंतर करता महसूस
दुनिया का दर्शन अनजान दिखता
पहले का जीया एक क्षण नही पाता
इस समय जिसे कहता अपना
खुशियो के लम्हे
लंबी अवधि के बाद
बदल चुके मुझे
कहां हूँ अब मैं वही
विगत भूला बूरे स्वप्न की तरह
इतराता हूँ अपने पर आज
मेरा समय
बाहरी सत्ता का सौंदर्य भी
सुख उपभोग मदभरा रसीला
भीतर घूटता तडपता
ओरों का दर्द अब भस्म हुआ
नही दिखता घने प्रकाश मे
ओट मे सिसकता अंधेरा
करवट सत्ता सत्य लेने से पहले
गुम जाते अंधेरो के दर्द
ओर यूँ ही तूफान झेलते
बिखर जाते जिन्दगी के अपने क्षण
चुराये छलावा देकर
आखिरकार भुगताना रहेगा
तुम्हारे लिए बाकी अंतिम तक ।
छगन लाल गर्ग ।