Sunday, March 13, 2016

आह घुली ।

व्यक्तिगत विडंबना
बढाती भार
परम ताप पाता अहंकार
निखरता परिपक्व बन व्यक्तित्व
बखान योग्य 
हर अवसर पाता वर्चस्व
पर पीडन संवेदना
ओर अधिक सालती
आत्मा मे उभरती जाती
जलते लावे सी ज्वाला
चलते कदमों
हर दिशा तलाशती दृष्टि
ढूँढता हूँ
सूजन फूटते पैरों से संघर्ष करता
जिन्दगी की श्वास पाने निमित्त
हाथ फैलाया
कल वाला भिखारी
अनायास देखता हूँ एक भीड़
चौराहे पर स्थित नीम
विशाल वृक्ष दीर्घाकार हुआ जाता
भीड़ से घीरा
ओर हृदय मे एक जलती सी
वेदना की टीस
लकीर खिंचती दबाव से
जीगर चीरती निकलती
नहीं रहा वह
विजय का डंका बजा
एक बार फिर
समर्थों की व्यवस्था का
अंतरतम मे तम
विशाल आकार लिए
अतिक्रमण करता ओर
जीने के संघर्ष मे
नथूनों से श्वास प्रक्रिया
रफ्तार बढ़ने मे तल्लीन
लगता आह घूली
जाने वाले के संग।
छगन लाल गर्ग ।