गजब स्फूर्ति
पाता शिथिल तन
सुनता नवल कुसुम खिला
उजडे गुलशन
हवाओं का चक्रवात
आने लगा समझ
घेराव डालती नाचती पवन
मिट्टी संग
ठीक मेरी तरह
प्राण राग उकेरता
तन मिट्टी बना
घुला मिला अस्तित्व एकराग
नहीं रही भिन्नता
भीतर बाहर पहुँच हुई
पहली बार आनंद द्वार
आमंत्रित हूँ खुले दरवाजे
अनंत यात्रा निमित्त
नहीं अंत कभी
हर बार नव आकार लिए
कभी चक्रवात तो
कभी ऑधी
कभी शीतल मंद बयार
हिडोलित करती जाती
आत्ममय आकार प्राकृत
यह आभास का छाया
बनने लगा हकीकत
इसी जीवन कर्म बंधन
देते जाते परिणाम
आस्था जुड़े प्रश्न स्वयं
बनने लगे जवाब
हिसाब संतुलन बराबर
स्वयं कर्ता करता ।
छगन लाल गर्ग ।