Wednesday, March 16, 2016

धुँधली राहें।


साफ सुथरा शरीर
धवल धारित श्वेत वस्त्र
सौरभ स्व यशस्वी यौवन काल
त्रिगुणोतम मानव
सृष्टि रचना का श्रेष्ठतम
अब मंजता हुआ
अपने स्वाभाविक रस से भिन्न
नहीं आपूर्ति संतुष्ट ईश्वरीय
स्वविवेक का अहं
विज्ञान संश्लेषण क्रियाओं में
स्वंभू बना
नहीं आस्थामय राग जड बना
मूर्त अनुभूतिओं का साक्षी
न्याय की तरह
सुखता जाता भीतर
गहन शुष्कता की आग को
देता जाता हवा
विद्धुत पंखे की तरह
तलाश करता उसी में
शीतल हवा की जींवंत नवल मधु स्मित
आँकाक्षा आनंद भरी
अनंत खोज जारी निरंतर
राह का अन्वेषण भूला
गलत गलियारों में
अणुओं के अस्तित्व में खोया
आज प्रबुद्ध चेतना शिरोमणि
भावी नहीं अब रोशन
कि दिखाई दे अग्रिम राह ।
छगन लाल गर्ग ।