Wednesday, March 16, 2016

रजनी मोह ।

अब नही रही आस
उजालो की
अधिकांश जी चुका
जग के उजाले
हर रश्मि देती रही
नया बोध
हकीकत
नहीं बन सका
हर बोध
क्षण का
हर अणु लेता जाता
करवटे
नहीं पहचान मे
आ पाता
समय का घूमता पहिया
फिर
बोध ओर क्षण का
कभी नहीं रहा
साथ
दोनों चलते
ताउम्र अपनी गरज
ओर मैं घसीटता रहा
नित्य
वक्त के कदमों तले
रोशनी के कतरे
नहीं बन सके मेरे
अहसास होता रहा
अंधेरा जीवन पर्यंत
हर वक्त हर पल
यही अनुभूति पाया
जीवन
नहीं चाहता उजालों से
कोई आस
अच्छा लगने लगा मुझे
रजनी मोह ।
छगन लाल गर्ग ।