Tuesday, March 8, 2016

भीखारी रहा ।

नहीं भरता अभी तक
अभिलाषा पात्र
हर संभव
पाने के बाद
अधिक आकूल होता जाता
चाहत की तृष्णा
अमिट विपन्नता लिए
उजागर होती
दैत्य बना
ओर हृदय वृत्ति पलटकर
बन जाता पिपासा का
स्थूल बिंब
संदेह पनपने लगता
स्वयं का अपनापन
पीता रहता
बेहोश प्यासे के
नीर की तरह
नहीं मिटती तृष्णा
अंतिम पडाव भी
सब कुछ दिखता
ओर कहती दुनिया
फल पाये सफल मानव
पर हृदय नहीं मानता
कि संतुष्ट हूँ मैं
अंत समय का
सच यही
भिखारी ही रहा मैं ।
छगन लाल गर्ग।