सहारा हैं कविता
कुछ अनगढ कवियों का
आत्मा को नहीं होती
सहारे की आवश्यकता
मन बेसहारा
वह ढूँढता रहता सहारा
अपनी जरूरत
जिसमे मात्र छीपा गहरे तल
अहंकार का घाव
वहीं रीसता जाता शब्द बनकर
पर यह नहीं जरूरी
कि हर व्यक्ति हो कवि
ओर हर व्यक्ति पा जाये
आत्मियता
यह सर्वथा अलग सत्य
आजकल किताबी शिक्षा
बन गयी मापदंड दम खम
कवि का
अंकन का सरल आधार
ओर पाठक होते रहते
निराश
बिना आत्मीयता की रचना
मन की जन्मी
चाहती बैशाखियां
अब नहीं जरूरी यह
कि बैशाखी काली या सफेद
डिग्री पढी या स्कूल
नहीं इसका मतलब
लंगडे मन को चाहिए
मात्र सहमति
सहारे की आवश्यकता
ओर इसी कारण
शुष्क जीवन कर जाती
कविता
अपने से लडती
उलझी झगडती कविताएँ
कहां पायें आत्मरस
ओर हम
कह पाये उसे काव्य
घना बीहड जीवन
जहाँ कवि हृदयों को
झूझना होता बेअर्थ प्रलाप से
ओर चेतन को
मिलती रहती
चुनौती स्वमूल्यांकन की
नहीं हो पाता सोचा
कि मिले कही जीवन रस
काम योग्य
कवि का
लंगडा मन कुछ कृत्य चाहता
ओर इसी कृत्य का परिणाम
आज के नव कवियों की कविता ।
छगन लाल गर्ग ।