Saturday, March 12, 2016

पात्रता ।

नहीं रखता कोई ढंग
पाने लायक विशिष्टता
अव्यवस्थित संस्कार जीता
बेहिसाब जिन्दगी
कद्रलायक हुनर नहीं पाया
मिल सके पहचान
सारे करतूत आम मेरे
बौनेपन की जिन्दगी मेरी
नालायकी के होते
नहीं हो पाता गुनाह विशिष्ट
ओर इसी निमित्त
नहीं रह पाती चिंता
सुख मिले कि दुख
बेढंगा हूँ मैं
बडप्पन के विष पीते लोग
प्याले भर भर
वहीं विष उडेलते मेरी ओर
पात्रता का प्याला मेरा
नहीं रंगीन
वहीं बडप्पन विष
आते ही मेरे प्याले बन जाता
अमृत
ओर जब लेता हूँ उपभोग
लगाता हूँ अपने होठ
मिट जाती कटुता मौत सी
युग युग की
ओर बहने लगते मधु के निर्झर
अंतर हैं पात्रता का।
छगन लाल गर्ग ।