अज्ञान का विस्तार
अहंकार प्रवंचना में
घने अंधकार नहीं सुझता
रोशनी का आना
मेरा जीवन
विकलावस्था का यथार्थ
सुख क्षणिक छलावे सा
कुंठित करता जाता राहें
लक्ष्य तोडते जाते
अस्तित्व मेरा
नहीं मिल पाता प्रकाश
कि देख सकूँ
सुख की डगर स्थिर
नहीं स्थिर सुख सत्य
ओर सत्य होता भी
अज्ञात अकल्पित
जडता पल्लवन चलता
साथ साथ
मिटने बनने का क्रम
क्रियान्वयन संदेश
वहीं अंकुरित होता
अव्यक्तव्य
ओर होती रहती हैरानी
अतीत नहीं देखा कभी
घटित होते
वह आज नव आकार से
अंकुर लेता
संचय जीता निरंतर
कल नहीं था
वह हैं विद्यमान आज
रहेगा यह भी संचय
अनिश्चितता का सार
कच्ची पृष्ठभूमि जीवन
अहंकार का बोझ पाया
अतृप्त आँकाक्षा लिए
व्यतीत होता
आज मानव जीवन ।
छगन लाल गर्ग।
अहंकार प्रवंचना में
घने अंधकार नहीं सुझता
रोशनी का आना
मेरा जीवन
विकलावस्था का यथार्थ
सुख क्षणिक छलावे सा
कुंठित करता जाता राहें
लक्ष्य तोडते जाते
अस्तित्व मेरा
नहीं मिल पाता प्रकाश
कि देख सकूँ
सुख की डगर स्थिर
नहीं स्थिर सुख सत्य
ओर सत्य होता भी
अज्ञात अकल्पित
जडता पल्लवन चलता
साथ साथ
मिटने बनने का क्रम
क्रियान्वयन संदेश
वहीं अंकुरित होता
अव्यक्तव्य
ओर होती रहती हैरानी
अतीत नहीं देखा कभी
घटित होते
वह आज नव आकार से
अंकुर लेता
संचय जीता निरंतर
कल नहीं था
वह हैं विद्यमान आज
रहेगा यह भी संचय
अनिश्चितता का सार
कच्ची पृष्ठभूमि जीवन
अहंकार का बोझ पाया
अतृप्त आँकाक्षा लिए
व्यतीत होता
आज मानव जीवन ।
छगन लाल गर्ग।