Thursday, March 24, 2016

मेरा प्रेम।


लुभाता घना
प्रेम शब्द
अच्छा लगता ओर अधिक
जब चाहत हमारी
कामयाब होकर
रस घोलती सी कहती
प्रेम का इकरार
ओर तब हम खूब भर जाते
उन्माद की तंरगों मे
वीणा के मधुर संगीत स्वर
रसमयी धार उडेल देते
तन मन
खूब उलझ जाते हम
आ जाते बातों मे फिर
जो भी कहें
शास्त्रीय वचन
अच्छे समर्पित ज्ञानी बन
वहीं करते
जो मृदुल मादक स्वर कहते
क्या कहूँ इसे
क्या शात्विक स्नेह का दरिया कहूँ
या कि वासना की गरज
कहां हैं सत्य
कहां हैं प्रेम
नहीं सत्य यह सब
बड़ी कडवडाहट भरी हैं जिन्दगी
केवल व्यवहारिक बना
हमारा जीवन
शाश्वत प्रेम अब कहां
नहीं करते ऐसा प्रेम हम
खुद अपने आप से भी ।
छगन लाल गर्ग।