Tuesday, March 15, 2016

अब रहने दो।

अब रहने दो
फिर कहती हो नही
तिलमिलाती हो रात भर
दर्द भरी आहें
रात भरी सोने नही देती
ओर तुम्हारी कराहें
भीतर तक कसोटती रहती
रात दिन
तुम्हारी बहु आधुनिक
नही जानती शायद
रसोई काम
अच्छा रहा तुम्हारा जानना
यदि सीखे
पर अभी तक दशक से
कोई ललक पाई नही
केवल काम करते करती अवलोकन
तुम्हारा
नही उम्मीद अब की रूचेगा उसे
रसोई का काम
ओर तुम्हारी हिम्मत देने लगी जवाब
क्या हो
अच्छा होगा उनसे  आशा छोड
ढूँढ लो कोई कामवाली बाई
अब तुम्हे क्या
यदि होती निन्दा बहु की
हिम्मत दे सके तुम्हें तो
होता रहे आपसी समझोता
पर मुझे तरस आता
हालात तुम्हारी देखकर
कोई तो उपाय हो ।
छगन लाल गर्ग ।