शायद यह भराव
मानवीय मर्म होगा
सुकोमल गात सा
नवनीत विकसित
अंतर्मन का सत्य
चाहता
भावनाओं का बिंब उभरे
अपनेपन में
ओर यह अपनापन केवल
जग का
काम चलाऊ दिखावा
दिखे समूह बीच
सराहना निमित्त
भीतर भरा भारी
घृणा भराव
उफान लेता नितांत एकांत
उगलता जाता
विष का धुँऑ
सबल होने का मद
देता उलाहना
अपनत्व सागर को
कि विषेला बन जाता
अमृत का दरिया
ओर बाहर बाहर उफान जहर
बन उभरती लहरें
भ्रमित सौन्दर्य प्रेमी
लेते आनंद
दृश्य उभरा
भीतरी सत्य नहीं हुआ उजागर
आज तक
कहीं प्रतिष्ठा मद का
यह अभिनय
संजोता रहता
सपनों का अपनत्व।
छगन लाल गर्ग ।
मानवीय मर्म होगा
सुकोमल गात सा
नवनीत विकसित
अंतर्मन का सत्य
चाहता
भावनाओं का बिंब उभरे
अपनेपन में
ओर यह अपनापन केवल
जग का
काम चलाऊ दिखावा
दिखे समूह बीच
सराहना निमित्त
भीतर भरा भारी
घृणा भराव
उफान लेता नितांत एकांत
उगलता जाता
विष का धुँऑ
सबल होने का मद
देता उलाहना
अपनत्व सागर को
कि विषेला बन जाता
अमृत का दरिया
ओर बाहर बाहर उफान जहर
बन उभरती लहरें
भ्रमित सौन्दर्य प्रेमी
लेते आनंद
दृश्य उभरा
भीतरी सत्य नहीं हुआ उजागर
आज तक
कहीं प्रतिष्ठा मद का
यह अभिनय
संजोता रहता
सपनों का अपनत्व।
छगन लाल गर्ग ।